रीतिकाल के सबसे व्यावहारिक कवि वृंद (वृंदावनदास, 1643-1723) को पढ़ें तो लगता है जैसे कोई अनुभवी बुजुर्ग जीवन के गुर सिखा रहा हो। वे मेड़ता, जोधपुर के रहने वाले थे और कृष्णगढ़ नरेश के गुरु बने। उनकी वृंद सतसई के दोहे आज भी नीति, व्यवहार और सच्ची समझदारी सिखाते हैं। नीचे उनके प्रसिद्ध दोहों की सूची दी गई है, क्लिक करके अर्थ सहित पूरा पाठ पढ़ें:
वृंद के दोहे - दोहावली पूरी सूची
- दुष्ट न छांड़ै दुष्टता - प्रसिद्ध नीति दोहा
- वृंद दोहावली - मुख्य संग्रह - सभी दोहों की सूची
- कहुँ अवगुन सोइ होत - प्रसिद्ध दोहा अर्थ सहित
- वृंद दोहावली - विस्तृत संग्रह - दोहावली भाग 2
- अन-उद्यमही - उद्यम पर दोहा
- वृंद के दोहे अर्थ सहित - व्याख्या सहित संग्रह
- मधुर बचन तैं जात मिट - मीठी वाणी पर प्रसिद्ध दोहा
- वृंद के दोहे - अर्थ भाग 2 - और दोहे अर्थ सहित
- एकहि गुन ऐसौ भलौ - गुण पर दोहा
- मूरख गुन समझै नहीं - मूर्खता पर दोहा
- संच्यौ किहिं का - संचय पर दोहा व्याख्या सहित
- अपनी पहुँच बिचारि कैं - सामर्थ्य पर प्रसिद्ध दोहा
- अति परचै तैं होत है - अति परिचय पर दोहा
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