पलटू साहब (लगभग 18वीं शताब्दी) निर्गुण संत परंपरा के प्रमुख संत-कवियों में माने जाते हैं। वे पलटू पंथ के प्रवर्तक थे और उनकी साधना में गुरु-भक्ति, नाम-स्मरण, आत्मज्ञान तथा आंतरिक साधना को विशेष महत्व मिलता है। उनकी वाणी में बाहरी आडंबर और कर्मकांड की अपेक्षा मनुष्य के भीतर स्थित सत्य और ईश्वर की खोज पर बल दिखाई देता है।
पलटू साहब के सबद
- क्यों तू फिरै भुलानी जोगिनि
- चादर लेहु धुवाइ है
- ई मन बनिया बान न छोडै
- पानी बीच बतासा साधो
- पढ़ि-पढ़ि क्या तुम कीन्हा पंडित
- वह दरबारा भारा साधो
- निंदरिया मोरी बैरिन भई
- बनिया समुझ कै लाद लदनियाँ
- लादि चला बंजारा है
- मेरे मनुआँ रे तुम तो निपट अनारी
- बूझि बिचारि गुरु कीजिये
- सो बनिया जो मन को तौलै
- पाती आई मोरे पीतम की
- अरे मोरे सबद बिबेकी हंसा
- कै दिन का तोरा जियना रे
- तिरथ में बहुत हम खोजा
- वृद्ध भये तन खासा
- तोमें है तेरा राम बैरागिन
- साहिब से लागी री सजनी
- पूरा सतगुरु मिलै जो पूजै