संत जगजीवन साहब का नाम उत्तर भारत की निर्गुण संत परंपरा और सतनामी साधना से जुड़ा है। उनका संबंध बाराबंकी क्षेत्र से था और संत बुल्ला को उनका गुरु माना जाता है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए उन्होंने भक्ति और साधना का मार्ग अपनाया तथा सतनामी पंथ को संगठित रूप दिया।
जगजीवन साहब की कविता में गुरु के प्रति समर्पण, नाम की महिमा, आत्मा और परमात्मा का संबंध तथा संसार से विरक्ति जैसे भाव बार-बार उभरते हैं। उनके पद और सबद उपदेशात्मक होते हुए भी सीधे और सहज हैं। ‘ज्ञान प्रकाश’, ‘महाप्रलय’, ‘शब्द सागर’, ‘आग विनाश’ और ‘प्रेम-पथ’ आदि उनके नाम से संबद्ध प्रमुख कृतियाँ हैं। संत साहित्य में उनकी रचनाएँ निर्गुण भक्ति के साथ लोकजीवन और आध्यात्मिक चिंतन को जोड़ने के लिए उल्लेखनीय हैं।
संत जगजीवन साहब के सबद
- ए मन त्यागि देहु गुमान
- मन मदमाते फिरहिं बेहाल
- कलि की रीति सुनहु रे भाई
- जे जन नाम भजि बलवान
- अरी मैं तो नाम के रंग छकी
- साधो सुमिरौ नाम रसाला
- अरे मन जपहु मंत्र बिचारि
- तू गगन मंडल धुनि लाव रे
- साधो भक्ति नहीं औसान
- मनुवाँ ऐसी प्रीति लगाव
- अरी मोरे नैन भये बैरागी
- सांईं मैं नहीं कछु जाना
- बंदा कौन बंदगी करई
- तुम सों मन लागो है मोरा
- साधो देखहु अपने मनहिं बिचारी
- साईं मैं नहिं आप को चीन्हा
- मैं तन-मन तुम्ह पर वारा