संत बीरू साहिब के जीवन के बारे में प्रमाणिक जानकारी बहुत सीमित मिलती है, लेकिन संत परंपरा में उनका संबंध बावरी साहिबा और यारी साहब से स्पष्ट रूप से जुड़ा हुआ है। वे बावरी साहिबा के प्रमुख शिष्यों में गिने जाते हैं और प्रसिद्ध संत यारी साहब के गुरु माने जाते हैं। उनके जीवनकाल की निश्चित जन्म-मृत्यु तिथियाँ उपलब्ध नहीं हैं।
बीरू साहिब के तीन सबद मिलते हैं। इनमें मन की साधना, सुमिरन, गुरु-शब्द और भीतर अनुभव किए जाने वाले आध्यात्मिक स्वरूपों का उल्लेख मिलता है। ‘त्रिकुटी के नीर तीर बाँसुरी बजावै लाल’ जैसे सबद में अनहद नाद, त्रिकुटी और आंतरिक साधना से जुड़े योगपरक संकेत दिखाई देते हैं। उनकी रचनाएँ संत काव्य की उस धारा का परिचय देती हैं जिसमें बाहरी आडंबर से अधिक साधक के भीतर होने वाले आध्यात्मिक अनुभवों पर जोर मिलता है।