सगरामदास की कविता में लोकजीवन से निकली सहज सीख और राम-भक्ति साथ-साथ दिखाई देती है। वे छोटी-छोटी बातों और रोजमर्रा के उदाहरणों से मनुष्य को जीवन की अस्थिरता, मोह और सांसारिक दिखावे से सावधान करते हैं। उनके पदों में भक्ति के साथ सदाचार और आत्मचिंतन का आग्रह भी मिलता है।
कुंडली और सबद उनकी उपलब्ध रचनाओं के प्रमुख रूप हैं। भाषा कठिन आध्यात्मिक शब्दावली से दूर, बोलचाल के निकट और सीधे प्रभाव डालने वाली है। ‘कोउ जात न पाँत कुटुँब तेरा’ जैसे पदों में वे सांसारिक संबंधों की क्षणभंगुरता समझाते हुए राम-स्मरण की ओर संकेत करते हैं। इसी सरल लोकधर्मी अभिव्यक्ति के कारण सगरामदास की रचनाएँ संत काव्य की सहज परंपरा में अपना अलग स्थान रखती हैं।
सगरामदास के सबद और भक्ति पद
- या में कोई नहीं नर तेरो रे
- कोउ जात न पाँत कुटुँब तेरा
- अब कहा सोय राम कह भाई
- नर जाग जगावत हैं सतगुरू
- सब दानव देव पुनंग कहा
- बंदे चेतन होय चितार साईं
- परसा गुरुदेव मो सिर तपे
- इन देख दया मोहि आवत है
- देखो देखो दुगीन की दोस्ती रे