परवीन शाकिर (Parveen Shakir) (1952–1994) आधुनिक उर्दू अदब की अत्यंत लोकप्रिय और प्रभावशाली शायरा थीं। कराची में जन्मी परवीन शाकिर ने अंग्रेज़ी साहित्य और भाषाविज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त की और अध्यापन के बाद 1982 में पाकिस्तान की सिविल सेवा (CSS) में वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर अपनी सेवाएँ दीं।
1976 में प्रकाशित उनके पहले काव्य-संग्रह ‘ख़ुशबू’ ने उर्दू शायरी की दुनिया में तहलका मचा दिया। इसके उपरांत ‘सद-बर्ग’, ‘ख़ुदकलामी’ और ‘इंकार’ जैसे कालजयी संग्रह आए, जिन्हें उनकी संपूर्ण ग्रंथावली ‘माह-ए-तमाम’ में संकलित किया गया। परवीन शाकिर ने उर्दू ग़ज़ल और नज़्म में स्त्री की अनुभूतियों, आत्मसम्मान, प्रेम, विरह और सामाजिक दबावों को एक विशिष्ट व नाज़ुक अंदाज़ दिया। 1990 में उन्हें Pride of Performance से अलंकृत किया गया। 26 दिसंबर 1994 को एक सड़क हादसे में उनका असामयिक निधन हुआ।
परवीन शाकिर की प्रसिद्ध ग़ज़लें (Parveen Shakir Ghazals in Hindi & Roman Urdu)
हिंदी में ग़ज़लें
- कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
- कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की
- वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
- परवीन शाकिर की लोकप्रिय ग़ज़लें व अश'आर संग्रह
- चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया
- पूरा दुख और आधा चाँद
- कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी
- अक्स-ए-ख़ुशबू हूँ बिखरने से न रोके कोई
- अब भला छोड़ के घर क्या करते
- अपनी रुस्वाई तिरे नाम का चर्चा देखूँ
- बहुत रोया वो हम को याद कर के
- टूटी है मेरी नींद मगर तुम को इस से क्या
- हम ने ही लौटने का इरादा नहीं किया
- गए मौसम में जो खिलते थे गुलाबों की तरह
- तेरी ख़ुश्बू का पता करती है
- बिछड़ा है जो इक बार तो मिलते नहीं देखा
- बादबाँ खुलने से पहले का इशारा देखना
- धनक धनक मिरी पोरों के ख़्वाब कर देगा
- रस्ता भी कठिन धूप में शिद्दत भी बहुत थी
- हर्फ़-ए-ताज़ा नई ख़ुशबू में लिखा चाहता है
- पा-ब-गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन
- अपनी तन्हाई मिरे नाम पे आबाद करे
- अब इतनी सादगी लाएँ कहाँ से
- शौक़-ए-रक़्स से जब तक उँगलियाँ नहीं खुलतीं
- बख़्त से कोई शिकायत है न अफ़्लाक से है
- बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गए
- इक हुनर था कमाल था क्या था
- कुछ फ़ैसला तो हो कि किधर जाना चाहिए
- क़ैद में गुज़रेगी जो उम्र बड़े काम की थी
- अगरचे तुझ से बहुत इख़्तिलाफ़ भी न हुआ
- जुस्तुजू खोए हुओं की उम्र भर करते रहे
- शब वही लेकिन सितारा और है
- वो हम नहीं जिन्हें सहना ये जब्र आ जाता
- डसने लगे हैं ख़्वाब मगर किस से बोलिए
- गुलाब हाथ में हो आँख में सितारा हो
- दिल का क्या है वो तो चाहेगा मुसलसल मिलना
- तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ साथ
- वक़्त-ए-रुख़्सत आ गया दिल फिर भी घबराया नहीं
- ताज़ा मोहब्बतों का नशा जिस्म-ओ-जाँ में है
- खुली आँखों में सपना झाँकता है
- दुआ का टूटा हुआ हर्फ़ सर्द आह में है
Roman (Hinglish) में ग़ज़लें
- Kuchh to hawa bhi sard thi kuchh tha tera KHayal bhi
- Ku-ba-ku phail gai baat shanasai ki
- Wo to KHush-bu hai hawaon mein bikhar jaega
- Chalne ka hausla nahin rukna muhaal kar diya
- Pura dukh aur aadha chand
- Kamal-e-zabt ko KHud bhi to aazmaungi
- Aks-e-KHushbu hun bikharne se na roke koi
- Ab bhala chhoD ke ghar kya karte
- Apni ruswai tere nam ka charcha dekhun
- Bahut roya wo hum ko yaad kar ke
- TuTi hai meri nind magar tumko is se kya
- Humne hi lauTne ka irada nahin kiya
- Gae mausam mein jo khilte the gulabon ki tarah
- Teri KHushbu ka pata karti hai
- BichhDa hai jo ek bar to milte nahin dekha
- Baadban khulne se pahle ka ishaara dekhna
- Dhanak dhanak meri poron ke KHwab kar dega
- Rasta bhi kaThin dhup mein shiddat bhi bahut thi
- Harf-e-taza nai KHushbu mein likha chahta hai
- Pa-ba-gil sab hain rihai ki kare tadbir kaun
- Apni tanhai mere nam pe aabaad kare
- Ab itni sadgi laen kahan se
- Shauq-e-raqs se jab tak ungliyan nahin khultin
- BaKHt se koi shikayat hai na aflak se hai
- Barish hui to phulon ke tan chaak ho gae
- Ek hunar tha kamal tha kya tha
- Kuchh faisla to ho ki kidhar jaana chahiye
- Qaid mein guzregi jo umr baDe kaam ki thi
- Agarche tujhse bahut iKHtilaf bhi na hua
- Justuju khoe huon ki umr bhar karte rahe
- Shab wahi lekin sitara aur hai
- Wo hum nahin jinhen sahna ye jabr aa jata
- Dasne lage hain KHwab magar kis se boliye
- Gulab hath mein ho aankh mein sitara ho
- Dil ka kya hai wo to chahega musalsal milna
- Tera ghar aur mera jangal bhigta hai sath sath
- Waqt-e-ruKHsat aa gaya dil phir bhi ghabraya nahin
- Taza mohabbaton ka nasha jism-o-jaan mein hai
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यहाँ परवीन शाकिर की ग़ज़लें हैं — ‘कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी’, ‘कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की’, ‘वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा’, ‘परवीन शाकिर की लोकप्रिय ग़ज़लें व अश'आर संग्रह’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।