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नज़ीर अकबराबादी की ग़ज़लें: Nazeer Akbarabadi Ghazal in Hindi

2026-10-03 · ग़ज़ल / Ghazal / शायरी / Shayari

नज़ीर अकबराबादी उर्दू शायरी के ऐसे अनोखे कवि थे जिन्होंने कविता को राजदरबारों और अभिजात वर्ग की सीमाओं से निकालकर आम लोगों के जीवन से जोड़ा। उनका वास्तविक नाम वली मुहम्मद था और ‘नज़ीर’ उनका तख़ल्लुस था। उनका जन्म 1735 के आसपास दिल्ली में हुआ था, जबकि जीवन का बड़ा हिस्सा आगरा में बीता

नज़ीर अकबराबादी का निधन 1830 के आसपास आगरा में हुआ। उर्दू साहित्य के इतिहास में उन्हें आम आदमी और लोकजीवन का शायर कहा जाता है। उनकी कविताएँ आज भी इसलिए पढ़ी जाती हैं क्योंकि उनमें अपने समय के समाज के साथ-साथ मानवीय जीवन की ऐसी सच्चाइयाँ मिलती हैं जो अलग-अलग दौर के पाठकों से जुड़ती हैं

दूर से आए थे साक़ी सुन के मय-ख़ाने को हम

दूर से आए थे साक़ी सुन के मय-ख़ाने को हम

बस तरसते ही चले अफ़्सोस पैमाने को हम

मय भी है मीना भी है साग़र भी है साक़ी नहीं

दिल में आता है लगा दें आग मय-ख़ाने को हम

क्यूँ नहीं लेता हमारी तू ख़बर ऐ बे-ख़बर

क्या तिरे आशिक़ हुए थे दर्द-ओ-ग़म खाने को हम

हम को फँसना था क़फ़स में क्या गिला सय्याद का

बस तरसते ही रहे हैं आब और दाने को हम

ताक़-ए-अबरू में सनम के क्या ख़ुदाई रह गई

अब तो पूजेंगे उसी काफ़िर के बुत-ख़ाने को हम

बाग़ में लगता नहीं सहरा से घबराता है दिल

अब कहाँ ले जा के बैठें ऐसे दीवाने को हम

क्या हुई तक़्सीर हम से तू बता दे ऐ 'नज़ीर'

ताकि शादी-मर्ग समझें ऐसे मर जाने को हम

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इस पन्ने की ग़ज़लें

यहाँ नज़ीर अकबराबादी की ग़ज़लें हैं — ‘दूर से आए थे साक़ी सुन के मय-ख़ाने को हम’, ‘कहा जो हम ने हमें दर से क्यूँ उठाते हो’, ‘हम अश्क-ए-ग़म हैं अगर थम रहे रहे न रहे’, ‘लिपट लिपट के मैं उस गुल के साथ सोता था’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।

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