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मलूकदास के सबद : Malukdas Ke Sabad

2026-09-22 · Shabad / Sabad / सबद

सत्रहवीं शताब्दी के संत-काव्य में मलूकदास का नाम अपनी स्पष्ट सामाजिक दृष्टि और आध्यात्मिक चिंतन के कारण उल्लेखनीय है। उनका जन्म 1574 में प्रयाग के निकट कड़ा में हुआ था और 1682 में उनका निधन माना जाता है। आरंभ से ही उनमें दान और विरक्ति की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी थी। आगे चलकर उन्होंने गृहस्थ जीवन और सांसारिक मोह से दूरी बनाते हुए भक्ति तथा साधना को अपने जीवन का केंद्र बनाया।

मलूकदास ने बाहरी आडंबर के बजाय मन की शुद्धता, दया, सत्य, वैराग्य और ईश्वर-स्मरण को महत्व दिया। उनके दोहों में जाति और धार्मिक भेद से ऊपर उठकर मनुष्य को देखने की दृष्टि मिलती है। ‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम’ वाला प्रसिद्ध दोहा भी उन्हीं से संबद्ध है, हालांकि उनके काव्य को केवल इस एक दोहे तक सीमित करना उनके व्यापक विचार-जगत को छोटा कर देता है। ‘ज्ञानबोध’, ‘रतनखान’, ‘भक्त बच्छावली’, ‘भक्ति-विवेक’ और ‘ज्ञानपरोछि’ उनकी प्रमुख कृतियों में गिनी जाती हैं। उनकी भाषा में अवधी के साथ आरंभिक खड़ी बोली के रूप भी दिखाई देते हैं।

मलूकदास के सबद

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