कुँवर बेचैन (1942–2021)
aकुँवर बेचैन (1942–2021)
कुँवर बेचैन (असली नाम कुँवर बहादुर सक्सेना) हिंदी ग़ज़ल के उन गिने-चुने शायरों में थे जिन्होंने ग़ज़ल को आम आदमी की ज़ुबान दी।
ग़ाज़ियाबाद में हिंदी के प्रोफ़ेसर रहे डॉ. बेचैन ने 'ग़ज़ल का व्याकरण' जैसी पुस्तक लिखी और कवि-सम्मेलनों के मंच पर भी खूब सराहे गए।
उनकी ग़ज़लें रोज़मर्रा के दुख-सुख, संघर्ष और उम्मीद को सरल-सीधी भाषा में बयाँ करती हैं।
यहाँ पढ़िए कुँवर बेचैन की चुनिंदा ग़ज़लें, जो हिंदी ग़ज़ल की एक ताज़ा और सजग आवाज़ हैं।
कुंवर बेचैन ग़ज़लें
- हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए
- कोई रस्ता है न मंज़िल न तो घर है कोई
- उँगलियाँ थाम के ख़ुद चलना सिखाया था जिसे
- चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
- ज़िंदगी यूँ भी जली यूँ भी जली मीलों तक
- साँचे में हम ने और के ढलने नहीं दिया
- मौत तो आनी है तो फिर मौत का क्यूँ डर रखूँ
- बड़ा उदास सफ़र है हमारे साथ रहो
- फूल को ख़ार बनाने पे तुली है दुनिया
- शोर की इस भीड़ में ख़ामोश तन्हाई सी तुम
- मत पूछिए कि कैसे सफ़र काट रहे हैं
Kunwar Bechain Ghazal in English or Roman
- ho ke mayus na yun sham se Dhalte rahiye
- koi rasta hai na manzil na to ghar hai koi
- ungliyan tham ke KHud chalna sikhaya tha jise
- choTon pe choT dete hi jaane ka shukriya
- zindagi yun bhi jali yun bhi jali milon tak
- sanche mein humne aur ke Dhalne nahin diya
- maut to aani hai to phir maut ka kyun Dar rakhun
- baDa udas safar hai hamare sath raho
- phul ko Khaar banane pe tuli hai duniya
- shor ki is bhiD mein KHamosh tanhai si tum
- mat puchhiye ki kaise safar kaT rahe hain
कुँवर बेचैन (असली नाम कुँवर बहादुर सक्सेना) हिंदी ग़ज़ल के उन गिने-चुने शायरों में थे जिन्होंने ग़ज़ल को आम आदमी की ज़ुबान दी।
ग़ाज़ियाबाद में हिंदी के प्रोफ़ेसर रहे डॉ. बेचैन ने 'ग़ज़ल का व्याकरण' जैसी पुस्तक लिखी और कवि-सम्मेलनों के मंच पर भी खूब सराहे गए।
उनकी ग़ज़लें रोज़मर्रा के दुख-सुख, संघर्ष और उम्मीद को सरल-सीधी भाषा में बयाँ करती हैं।
यहाँ पढ़िए कुँवर बेचैन की चुनिंदा ग़ज़लें, जो हिंदी ग़ज़ल की एक ताज़ा और सजग आवाज़ हैं।
कुंवर बेचैन ग़ज़लें
- हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए
- कोई रस्ता है न मंज़िल न तो घर है कोई
- उँगलियाँ थाम के ख़ुद चलना सिखाया था जिसे
- चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
- ज़िंदगी यूँ भी जली यूँ भी जली मीलों तक
- साँचे में हम ने और के ढलने नहीं दिया
- मौत तो आनी है तो फिर मौत का क्यूँ डर रखूँ
- बड़ा उदास सफ़र है हमारे साथ रहो
- फूल को ख़ार बनाने पे तुली है दुनिया
- शोर की इस भीड़ में ख़ामोश तन्हाई सी तुम
- मत पूछिए कि कैसे सफ़र काट रहे हैं
Kunwar Bechain Ghazal in English or Roman
- ho ke mayus na yun sham se Dhalte rahiye
- koi rasta hai na manzil na to ghar hai koi
- ungliyan tham ke KHud chalna sikhaya tha jise
- choTon pe choT dete hi jaane ka shukriya
- zindagi yun bhi jali yun bhi jali milon tak
- sanche mein humne aur ke Dhalne nahin diya
- maut to aani hai to phir maut ka kyun Dar rakhun
- baDa udas safar hai hamare sath raho
- phul ko Khaar banane pe tuli hai duniya
- shor ki is bhiD mein KHamosh tanhai si tum
- mat puchhiye ki kaise safar kaT rahe hain
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ कुंवर बेचैन की ग़ज़लें हैं — ‘हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए’, ‘कोई रस्ता है न मंज़िल न तो घर है कोई’, ‘उँगलियाँ थाम के ख़ुद चलना सिखाया था जिसे’, ‘चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।