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ख़ुमार बाराबंकवी की ग़ज़लें: Khumar Barabankvi Ghazal in Hindi

2024-12-03 · ग़ज़ल / Ghazal / शायरी / Shayari

ख़ुमार बाराबंकवी (Khumar Barabankvi) (1919–1999) आधुनिक उर्दू साहित्य के मूर्धन्य शायर, तरन्नुम के उस्ताद और प्रख्यात गीतकार थे। उनका मूल नाम मोहम्मद हैदर ख़ान था और उनका जन्म 15 सितंबर 1919 को बाराबंकी (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उन्हें बचपन से ही समृद्ध साहित्यिक वातावरण मिला; उनके पिता डॉ. गुलाम हैदर ‘बहार’ और चाचा क़रार बाराबंकवी दोनों ही अपने दौर के लब्धप्रतिष्ठ शायर थे।

ख़ुमार बाराबंकवी अपनी शास्त्रीय ग़ज़लों, अनूठे तरन्नुम और मुशायरों में दिलकश अंदाज़ के लिए दुनिया भर में मशहूर हुए। प्रेम, विरह, मानवीय संवेदनाओं और जीवन के यथार्थ को उन्होंने बेहद सहज व नफ़ीस ज़बान में ढाला। पारंपरिक ग़ज़लगोई में उनका नाम जिगर मुरादाबादी के साथ प्रमुखता से लिया जाता है।

उर्दू अदब के साथ उन्होंने हिंदी सिनेमा को भी कई यादगार नग़मे दिए। शाहजहाँ, बरादरी, साज़ और आवाज़ तथा लव एंड गॉड जैसी फ़िल्मों के लिए उन्होंने कालजयी गीत लिखे। उनके कलाम को के. एल. सहगल, मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर, मेहदी हसन, ग़ुलाम अली और जगजीत सिंह जैसे दिग्गजों ने अपनी आवाज़ दी है।

हदीस-ए-दीगराँ, आतिश-ए-तर, रक़्स-ए-मय, शब-ए-ताब और आहंग-ए-ख़ुमार उनके प्रमुख शायरी संग्रह (Books) हैं। 19 फरवरी 1999 को उनका इंतिक़ाल हुआ, लेकिन उनकी मखमली ग़ज़लें आज भी शायरी प्रेमियों के दिलों में ज़िंदा हैं। यहाँ उनकी मशहूर ग़ज़लों का संपूर्ण संग्रह (Devanagari & Roman Script) प्रस्तुत है।

ख़ुमार बाराबंकवी की प्रसिद्ध ग़ज़लें (Khumar Barabankvi Ghazal & Shayari Collection)

इस पन्ने की ग़ज़लें

यहाँ ख़ुमार बाराबंकवी की ग़ज़लें हैं — ‘वही फिर मुझे याद आने लगे हैं’, ‘इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए’, ‘न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है’, ‘ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत नहीं रही’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।

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