ख़ुमार बाराबंकवी (Khumar Barabankvi) (1919–1999) आधुनिक उर्दू साहित्य के मूर्धन्य शायर, तरन्नुम के उस्ताद और प्रख्यात गीतकार थे। उनका मूल नाम मोहम्मद हैदर ख़ान था और उनका जन्म 15 सितंबर 1919 को बाराबंकी (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उन्हें बचपन से ही समृद्ध साहित्यिक वातावरण मिला; उनके पिता डॉ. गुलाम हैदर ‘बहार’ और चाचा क़रार बाराबंकवी दोनों ही अपने दौर के लब्धप्रतिष्ठ शायर थे।
ख़ुमार बाराबंकवी अपनी शास्त्रीय ग़ज़लों, अनूठे तरन्नुम और मुशायरों में दिलकश अंदाज़ के लिए दुनिया भर में मशहूर हुए। प्रेम, विरह, मानवीय संवेदनाओं और जीवन के यथार्थ को उन्होंने बेहद सहज व नफ़ीस ज़बान में ढाला। पारंपरिक ग़ज़लगोई में उनका नाम जिगर मुरादाबादी के साथ प्रमुखता से लिया जाता है।
उर्दू अदब के साथ उन्होंने हिंदी सिनेमा को भी कई यादगार नग़मे दिए। शाहजहाँ, बरादरी, साज़ और आवाज़ तथा लव एंड गॉड जैसी फ़िल्मों के लिए उन्होंने कालजयी गीत लिखे। उनके कलाम को के. एल. सहगल, मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर, मेहदी हसन, ग़ुलाम अली और जगजीत सिंह जैसे दिग्गजों ने अपनी आवाज़ दी है।
हदीस-ए-दीगराँ, आतिश-ए-तर, रक़्स-ए-मय, शब-ए-ताब और आहंग-ए-ख़ुमार उनके प्रमुख शायरी संग्रह (Books) हैं। 19 फरवरी 1999 को उनका इंतिक़ाल हुआ, लेकिन उनकी मखमली ग़ज़लें आज भी शायरी प्रेमियों के दिलों में ज़िंदा हैं। यहाँ उनकी मशहूर ग़ज़लों का संपूर्ण संग्रह (Devanagari & Roman Script) प्रस्तुत है।
ख़ुमार बाराबंकवी की प्रसिद्ध ग़ज़लें (Khumar Barabankvi Ghazal & Shayari Collection)
- वही फिर मुझे याद आने लगे हैं
- इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए
- न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
- ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत नहीं रही
- हुस्न जब मेहरबाँ हो तो क्या कीजिए
- हम उन्हें वो हमें भुला बैठे
- हाल-ए-ग़म उन को सुनाते जाइए
- मुझ को शिकस्त-ए-दिल का मज़ा याद आ गया
- अकेले हैं वो और झुँझला रहे हैं
- तिरे दर से उठ कर जिधर जाऊँ मैं
- ये मिस्रा नहीं है वज़ीफ़ा मिरा है
- वो हमें जिस क़दर आज़माते रहे
- तू चाहिए न तेरी वफ़ा चाहिए मुझे
- ऐ मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुज़र गए
- बुझ गया दिल हयात बाक़ी है
- आँखों के चराग़ों में उजाले न रहेंगे
- वो सिवा याद आए भुलाने के बा'द
- झुँझलाए हैं लजाए हैं फिर मुस्कुराए हैं
- बात जब दोस्तों की आती है
- पी पी के जगमगाए ज़माने गुज़र गए
- हँसने वाले अब एक काम करें
- हिज्र की शब है और उजाला है
- कभी शेर-ओ-नग़्मा बन के कभी आँसुओं में ढल के
- दिल को तस्कीन-ए-यार ले डूबी
- क्या हुआ हुस्न है हम-सफ़र या नहीं
- ग़म दुनिया बहुत ईज़ा-रसाँ है
- कभी जो मैं ने मसर्रत का एहतिमाम किया
- होश-ज़दा नादान से डर
- मुझ को ये जान-ओ-दिल क़ुबूल नग़्मे को नग़्मा ही समझ
- सज्दों की रस्म-ए-कोहन को होश गँवा के भूल जा
- Wahi phir mujhe yaad aane lage hain
- Ek pal mein ek sadi ka maza humse puchhiye
- Na haara hai ishq aur na duniya thaki hai
- Aisa nahin ki un se mohabbat nahin rahi
- Husn jab mehrban ho to kya kijiye
- Hum unhen wo hamein bhula baiThe
- Haal-e-gham un ko sunate jaiye
- Mujhko shikast-e-dil ka maza yaad aa gaya
- Akele hain wo aur jhunjhla rahe hain
- Tere dar se uTh kar jidhar jaun main
- Ye misra nahin hai wazifa mera hai
- Wo hamein jis qadar aazmate rahe
- Tu chahiye na teri wafa chahiye mujhe
- Ai maut unhen bhulae zamane guzar gae
- Bujh gaya dil hayat baqi hai
- Aankhon ke charaghon mein ujale na rahenge
- Wo siwa yaad aae bhulane ke baad
- Jhunjhlae hain lajae hain phir muskurae hain
- Baat jab doston ki aati hai
- Aur ye nagin Dase hi jati hai
- Hansne wale ab ek kaam karen
- Hijr ki shab hai aur ujala hai
- Kabhi sher-o-naghma ban ke
- Dil ko taskin-e-yar le Dubi
- Kya hua husn hai ham-safar ya nahin
- Gham duniya bahut iza-rasan hai
- Kabhi jo maine masarrat ka ehtimam kiya
- Hosh-zada nadan se Dar
- Mujhko ye jaan-o-dil qubul
- Sajdon ki rasm-e-kohan ko
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ ख़ुमार बाराबंकवी की ग़ज़लें हैं — ‘वही फिर मुझे याद आने लगे हैं’, ‘इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए’, ‘न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है’, ‘ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत नहीं रही’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।