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जिगर मुरादाबादी की ग़ज़लें: Jigar Moradabadi Ghazal in Hindi

2024-12-04 · ग़ज़ल / Ghazal / शायरी / Shayari

जिगर मुरादाबादी (Jigar Moradabadi) (1890–1960) उर्दू ग़ज़ल के 'शहंशाह' और बीसवीं सदी के अत्यंत लोकप्रिय शास्त्रीय शायर थे। उनका वास्तविक नाम अली सिकंदर था और उनका जन्म 6 अप्रैल 1890 को मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनके पिता मौलवी अली नज़र स्वयं शायर थे, जिससे शायरी का संस्कार उन्हें विरासत में मिला। उन्होंने दाग़ देहलवी और असग़र गोंडवी से मार्गदर्शन प्राप्त किया। अपनी मखमली आवाज़, अद्वितीय तरन्नुम और भावपूर्ण अंदाज़ के कारण वे मुशायरों की जान माने जाते थे।

जिगर की मुख्य पहचान विशुद्ध ग़ज़लगोई से रही। उनके प्रमुख काव्य-संग्रहों में दाग़-ए-जिगर, शोला-ए-तूर और आतिश-ए-गुल शामिल हैं। संग्रह आतिश-ए-गुल के लिए उन्हें 1958 में प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जीवन के उत्तरार्ध में उनकी शायरी में आध्यात्मिक और सूफ़ी रंग गहराता गया। 9 सितंबर 1960 को गोंडा में उनका देहांत हुआ। यहाँ उनकी प्रसिद्ध ग़ज़लों का संकलन हिंदी व हिंग्लिश/रोमन दोनों में प्रस्तुत है।

जिगर मुरादाबादी की प्रसिद्ध ग़ज़लें (Jigar Moradabadi Ghazal Collection)

इस पन्ने की ग़ज़लें

यहाँ जिगर मुरादाबादी की ग़ज़लें हैं — ‘इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है’, ‘आदमी आदमी से मिलता है’, ‘हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं’, ‘ये है मय-कदा यहाँ रिंद हैं यहाँ सब का साक़ी इमाम है’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।

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