इंशा अल्ला ख़ाँ इंशा (लगभग 1752–1817) उर्दू, फ़ारसी और हिंदी के बहुभाषी कवि और लेखक थे। उनका जन्म मुर्शिदाबाद में हुआ और बाद में दिल्ली तथा लखनऊ के साहित्यिक और शाही दरबारों से जुड़े। अपनी भाषाई दक्षता और चुटीले अंदाज़ के कारण वे अपने समय के साहित्यिक संसार में अलग पहचान रखते थे।
इंशा की खास उपलब्धियों में ‘दर्या-ए-लताफ़त’ शामिल है, जिसे उर्दू भाषा के व्याकरण और भाषिक अध्ययन की शुरुआती महत्वपूर्ण कृतियों में गिना जाता है। उन्होंने ‘रानी केतकी की कहानी’ भी लिखी, जो आरंभिक हिंदी गद्य की उल्लेखनीय रचनाओं में है। ग़ज़ल, क़सीदा, मसनवी, रुबाई, रेख़्ती और व्यंग्य सहित उन्होंने कई विधाओं में लिखा।
इंशा अल्ला ख़ाँ इंशा की चुनिंदा ग़ज़लें (Selected Ghazals of Insha Allah Khan)
- कमर बाँधे हुए चलने को इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- अच्छा जो ख़फ़ा हम से हो तुम इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- मिल मुझ से ऐ परी तुझे इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- नींद मस्तों को कहाँ इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- गाली सही अदा सही इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- तब से आशिक़ हैं हम इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- मुझे क्यूँ न आवे साक़ी नज़र इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- चाहता हूँ तुझे नबी की क़सम इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- है मुझ को रब्त बस-कि इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- ज़मीं से उट्ठी है या चर्ख़ पर इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- दिल-ए-सितम-ज़दा बेताबियों ने इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- या वस्ल में रखिए मुझे इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- क्या मिला हम को तेरी यारी में इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- मियाँ चश्म-ए-जादू पे इतना घमंड इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- भले आदमी कहीं बाज़ आ अरे इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- आने अटक अटक के लगी साँस रात से इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- टुक आँख मिलाते ही किया काम हमारा इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- देखना जब मुझे कर शान ये गाली देना इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- बस्ती तुझ बिन उजाड़ सी है इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- तुम्हारे हाथों की उँगलियों की ये देखो पोरें इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- बंदगी हम ने तो जी से अपनी ठानी इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- लब पे आई हुई ये जान फिरे इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- धूम इतनी तिरे दीवाने मचा सकते हैं इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- जाड़े में क्या मज़ा हो इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- मुझे छेड़ने को साक़ी ने दिया इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- वो जो शख़्स अपने ही ताड़ में सो छुपा है इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- मिल गए पर हिजाब बाक़ी है इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- ज़ुल्फ़ को था ख़याल बोसे का इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- दीवार फाँदने में देखोगे काम मेरा इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- जब तक कि ख़ूब वाक़िफ़-ए-राज़-ए-निहाँ न हूँ इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
- जो बात तुझ से चाही है इंशा अल्ला खाँ इंशा की ग़ज़ल
इस पन्ने की ग़ज़लें
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