गुरु तेग बहादुर (1621–1675) सिख धर्म के नौवें गुरु और आध्यात्मिक चिंतक थे। उनका जन्म अमृतसर में हुआ था और बचपन का नाम त्याग मल था। उनकी वाणी में वैराग्य, निर्भयता, नाम-स्मरण, संसार की नश्वरता और ईश्वर-भक्ति के भाव प्रमुख हैं। वे ध्यान, साधना और मानव-सेवा के साथ धार्मिक स्वतंत्रता तथा सत्य के लिए अपने जीवन का बलिदान देने के लिए भी स्मरण किए जाते हैं।
गुरु तेग बहादुर की बाणी श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। इसमें 15 रागों में रचित पदों के साथ 57 सलोक शामिल हैं; कुल 115 रचनाओं का उल्लेख SGPC के विवरण में मिलता है। उनकी भाषा और काव्य में गहरी आध्यात्मिक अनुभूति के साथ जीवन, मृत्यु, मोह और निर्भयता पर गंभीर चिंतन दिखाई देता है। 1675 में दिल्ली में उनका बलिदान हुआ।
- दिल्ली में उनसे इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया, गुरु जी ने अपना धर्म छोड़ने से इनकार किया।
- इसके बाद उनका सिर सार्वजनिक रूप से काट दिया गया। उनके तीन प्रमुख साथियों, भाई मती दास, भाई दयाला दास और भाई सती दास, को भी मृत्युदंड दिया गया।
गुरु तेग बहादुर के सबद और बाणी
- सभ कछु जीवत को बिउहार
- काहे रे, बन खोजन जाई
- मन की मन ही माहिं रही
- साधो, रचना राम बनाई
- कहउँ कहा अपनी अधमाई
- हरि बिनु तेरो को न सहाई
- रे नर, इह साची जीअ धारि
- मन रे, साचा गहो बिवारा
- मन रे, प्रभ की सरनि बिचारो
- हरि के नाम बिना दुखु पावै
- प्रीतम जानि लेहु मन माही
- साधो, इह तनु मिथिआ जानो
- भूलिओ मनु माया उरझाइओ
- इह जगि मीतु न देखिओ कोई
- जगत में झूठी देखी प्रीति
- हरि को नामु सुखदाई
- माई, मनु मेरो बसि नाहिं
- हरि जू राषि लेहु पति मेरी
- काहे रे बन खोजन जाई
- नर अचेत, पाप ते डरु रे
- साधो कउन जुगति अब कीजै
- प्रानी कउनु उपाउ करै
- जो नरु दुख में दुखु नहिं मानै
- अब मैं कउनु उपाउ करउँ
- जामें भजनु राम को नाहीं
- माई मैं धनु पाइओ हरि नामु
- प्रानी कउ हरिजसु मनि नहिं आवै
- रे मन, राम सिउ करि प्रीति
- राम सिमर राम सिमर
- साधो, मन का मान तिआगो