शकील बदायूनी (Shakeel Badayuni) (1916–1970) उर्दू अदब के प्रख्यात शायर और हिंदी सिनेमा के कालजयी गीतकार थे। बदायूँ (उत्तर प्रदेश) में जन्मे शकील ने आरंभिक तालीम के दौरान ही उर्दू, फ़ारसी, अरबी और हिंदी साहित्य पर मजबूत पकड़ बनाई। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के दौर में वे मुशायरों के लोकप्रिय शायर के रूप में उभरे। अपनी नज़ाकत भरी रूमानी ग़ज़लों और नफ़ासत भरे अंदाज़ के लिए वे पूरे मुल्क में पहचाने गए।
वर्ष 1946 में फ़िल्म दर्द से उनके फ़िल्मी सफ़र का आग़ाज़ हुआ। महान संगीतकार नौशाद के साथ उनकी ऐतिहासिक साझेदारी ने भारतीय सिनेमा को बैजू बावरा, मदर इंडिया और मुग़ल-ए-आज़म जैसी अमर फ़िल्मों के अविस्मरणीय गीत दिए। शकील बदायूनी ने लगातार तीन वर्षों (1961 से 1963) तक प्रतिष्ठित फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार जीता। उनकी कालजयी ग़ज़लें आज भी साहित्य और संगीत प्रेमियों के दिलों में बसी हैं।
शकील बदायूनी की प्रसिद्ध ग़ज़लें (Popular Ghazals of Shakeel Badayuni)
- ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया
- ai mohabbat tere anjam pe rona aaya
- मेरे हम-नफ़स मेरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे
- mere ham-nafas mere ham-nawa mujhe dost ban ke dagha na de
- ग़म-ए-आशिक़ी से कह दो रह-ए-आम तक न पहुँचे
- gham-e-ashiqi se kah do rah-e-am tak na pahunche
- आज फिर गर्दिश-ए-तक़दीर पे रोना आया
- aaj phir gardish-e-taqdir pe rona aaya
- ऐ इश्क़ ये सब दुनिया वाले बे-कार की बातें करते हैं
- ai ishq ye sab duniya wale be-kar ki baaten karte hain
- कैसे कह दूँ की मुलाक़ात नहीं होती है
- kaise kah dun ki mulaqat nahin hoti hai
- अब तो ख़ुशी का ग़म है न ग़म की ख़ुशी मुझे
- ab to KHushi ka gham hai na gham ki KHushi mujhe
- ग़म-ए-इश्क़ रह गया है ग़म-ए-जुस्तुजू में ढल कर
- gham-e-ishq rah gaya hai gham-e-justuju mein Dhal kar
- कोई आरज़ू नहीं है कोई मुद्दआ' नहीं है
- koi aarzu nahin hai koi muddaa nahin hai
- मिरी ज़िंदगी पे न मुस्कुरा मुझे ज़िंदगी का अलम नहीं
- meri zindagi pe na muskura mujhe zindagi ka alam nahin
- आँख से आँख मिलाता है कोई
- aankh se aankh milata hai koi
- मिरी ज़िंदगी है ज़ालिम तिरे ग़म से आश्कारा
- meri zindagi hai zalim tere gham se aashkara
- जुनूँ से गुज़रने को जी चाहता है
- junun se guzarne ko ji chahta hai
- ये दुनिया है यहाँ दिल को लगाना किस को आता है
- ye duniya hai yahan dil ko lagana kis ko aata hai
- आख़िरी वक़्त है आख़िरी साँस है ज़िंदगी की है शाम आख़िरी आख़िरी
- aaKHiri waqt hai aaKHiri sans hai zindagi ki hai sham aaKHiri aaKHiri
- जीने वाले क़ज़ा से डरते हैं
- jine wale qaza se Darte hain
- तिरी अंजुमन में ज़ालिम अजब एहतिमाम देखा
- teri anjuman mein zalim ajab ehtimam dekha
- हंगामा-ए-ग़म से तंग आ कर इज़हार-ए-मसर्रत कर बैठे
- hangama-e-gham se tang aa kar izhaar-e-masarrat kar baiThe
- बदले बदले मिरे ग़म-ख़्वार नज़र आते हैं
- badle badle mere gham-KHwar nazar aate hain
- दिल के बहलाने की तदबीर तो है
- dil ke bahlane ki tadbir to hai
- ख़ुश हूँ कि मिरा हुस्न-ए-तलब काम तो आया
- KHush hun ki mera husn-e-talab kaam to aaya
- वो हम से दूर होते जा रहे हैं
- wo humse dur hote ja rahe hain
- ज़िंदगी उन की चाह में गुज़री
- zindagi unki chah mein guzri
- आँखों से दूर सुब्ह के तारे चले गए
- aankhon se dur subh ke tare चले गए
- निगाह-ए-नाज़ का इक वार कर के छोड़ दिया
- nigah-e-naz ka ek war kar ke chhoD diya
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ शकील बदायूनी की ग़ज़लें हैं — ‘ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया’, ‘ai mohabbat tere anjam pe rona aaya’, ‘मेरे हम-नफ़स मेरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे’, ‘mere ham-nafas mere ham-nawa mujhe dost ban ke dagha na de’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।