शाद अज़ीमाबादी (1846–1927) का असली नाम सैयद अली मुहम्मद था। उनका जन्म अज़ीमाबाद, वर्तमान पटना में हुआ था। बचपन से ही उन्हें शायरी में रुचि थी और उन्होंने अरबी, फ़ारसी तथा उर्दू की शिक्षा प्राप्त की। आगे चलकर उन्होंने अपने समय के कई उस्ताद शायरों से शायरी की बारीकियाँ सीखीं।
शाद अज़ीमाबादी मुख्यतः ग़ज़ल के शायर थे, हालांकि उन्होंने मर्सिया भी लिखा। उनकी शायरी में नए विचार और अभिव्यक्ति के अलग ढंग के साथ नैतिकता, दर्शन और रहस्यवाद जैसे विषय भी दिखाई देते हैं। उनका काव्य पाँच खंडों में प्रकाशित हुआ। उनके प्रमुख साहित्यिक कार्यों में कुल्लियात-ए-शाद, मयख़ाना-ए-इल्हाम, फ़िक्र-ए-बलीग़ और नवाए-वतन शामिल हैं। पटना के सामाजिक और प्रशासनिक जीवन में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही और उन्हें ‘ख़ान बहादुर’ की उपाधि मिली थी।
शाद अज़ीमाबादी की लोकप्रिय ग़ज़लें (Selected Ghazals of Shad Azimabadi)
- ढूँडोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं नायाब हैं हम
- DhunDoge agar mulkon mulkon milne ke nahin nayab hain hum
- तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ
- Tamannaon mein uljhaya gaya hun
- अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया
- Ab bhi ek umr pe jine ka na andaz aaya
- अगर मरते हुए लब पर न तेरा नाम आएगा
- Agar marte hue lab par na tera nam aaega
- एक सितम और लाख अदाएँ उफ़ री जवानी हाए ज़माने
- Ek sitam aur lakh adaen uf ri jawani hae zamane
- न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना
- Na dil apna na gham apna na koi gham-gusar apna
- कुछ कहे जाता था ग़र्क़ अपने ही अफ़्साने में था
- Kuchh kahe jata tha gharq apne hi afsane mein tha
- तेरी ज़ुल्फ़ें ग़ैर अगर सुलझाएगा
- Teri zulfen ghair agar suljhaega
- ये दिल-जमई जिए जब तक जिए जीना उसी का है
- Ye dil-jami jiye jab tak jiye jina usi ka hai
- मैं 'शाद' तन्हा इक तरफ़ दुनिया की दुनिया इक तरफ़
- Main shad tanha ek taraf duniya ki duniya ek taraf
- अब इंतिहा का तिरे ज़िक्र में असर आया
- Ab intiha ka tere zikr mein asar aaya
- हमारी आँखों में अश्कों का आ के रह जाना
- Hamari aankhon mein ashkon ka aa ke rah jaana
- क्या फ़क़त तालिब-ए-दीदार था मूसा तेरा
- Kya faqat talib-e-didar tha musa tera
- भागा तो बहुत था मौत से मैं कम-बख़्त ने लेकिन आन लिया
- Bhaga to bahut tha maut se main kam-baKHt ne lekin aan liya
- जब किसी ने हाल पूछा रो दिया
- Jab kisi ne haal puchha ro diya
- मिरे दाँतों की उम्र ऐ आरज़ू मुझ से भी छोटी थी
- Mere danton ki umr ai aarzu mujhse bhi chhoTi thi
- कहाँ ये ताब कि चख चख के या गिरा के पियूँ
- Kahan ye tab ki chakh chakh ke ya gira ke piyun
- नालों की कशाकश सह न सका ख़ुद तार-ए-नफ़स भी टूट गया
- Nalon ki kashakash sah na saka KHud tar-e-nafas bhi TuT gaya
- यही मौक़ा है ज़माने से गुज़र जाने का
- Yahi mauqa hai zamane se guzar jaane ka
- किसी को क्या ख़बर ऐ सुब्ह वक़्त-ए-शाम क्या होगा
- Kisi ko kya KHabar ai subh waqt-e-sham kya hoga
- ग़म-ए-फ़िराक़ मय ओ जाम का ख़याल आया
- Gham-e-firaq mai o jam ka KHayal aaya
- हरगिज़ कभी किसी से न रखना दिला ग़रज़
- Hargiz kabhi kisi se na rakhna dila gharaz
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ शाद अज़ीमाबादी की ग़ज़लें हैं — ‘ढूँडोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं नायाब हैं हम’, ‘DhunDoge agar mulkon mulkon milne ke nahin nayab hain hum’, ‘तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ’, ‘Tamannaon mein uljhaya gaya hun’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।