पद्मश्री बेकल उत्साही (Bekal Utsahi) (1928–2016) आधुनिक उर्दू शायरी, हिंदी गीत और लोक संस्कृति के मूर्धन्य हस्ताक्षर थे। उनका वास्तविक नाम मुहम्मद शफ़ी ख़ान था और उनका जन्म बलरामपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। वर्ष 1952 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनके ओजस्वी कलाम को सुनकर उन्हें ‘उत्साही’ नाम दिया, जो आगे चलकर उनकी साहित्यिक पहचान बन गया। वे संसद के उच्च सदन (राज्यसभा) के सदस्य रहे और 1976 में साहित्य व शिक्षा के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया गया। गंगा-जमुनी तहज़ीब, राष्ट्रीय एकता और दोहों-गीतों की मिठास उनकी रचनाओं की प्रमुख विशेषता रही।
बेकल उत्साही की प्रसिद्ध ग़ज़लें (Selected Ghazals of Bekal Utsahi)
- दिमाग़ अर्श पे है ख़ुद ज़मीं पे चलते हैं
- dimagh arsh pe hai KHud zamin pe chalte hain
- उधर वो हाथों के पत्थर बदलते रहते हैं
- udhar wo hathon ke patthar badalte rahte hain
- यूँ तो कहने को तिरी राह का पत्थर निकला
- yun to kahne ko teri rah ka patthar nikla
- जब कूचा-ए-क़ातिल में हम लाए गए होंगे
- jab kucha-e-qatil mein hum lae gae honge
- नए ज़माने में अब ये कमाल होने लगा
- nae zamane mein ab ye kamal hone laga
- तो पहले मेरा ही हाल-ए-तबाह लिख लीजे
- to pahle mera hi haal-e-tabah likh lije
- भीतर बसने वाला ख़ुद बाहर की सैर करे मौला ख़ैर करे
- bhitar basne wala KHud bahar ki sair kare maula KHair kare
- फ़स्ल-ए-गुल कब लुटी नहीं मा'लूम
- fasl-e-gul kab luTi nahin malum
- मैं जब भी कोई अछूता कलाम लिखता हूँ
- main jab bhi koi achhuta kalam likhta hun
- न चिलमनों की हसीं सरसराहटें होंगी
- na chilmanon ki hasin sarsarahaTen hongi
- ख़ुद अपने जुर्म का मुजरिम को ए'तिराफ़ न था
- KHud apne jurm ka mujrim ko etiraf na tha
- तंज़ की तेग़ मुझी पर सभी खींचे होंगे
- tanz ki tegh mujhi par sabhi khinche honge
- मुझ को शिकस्तगी का क़लक़ देर तक रहा
- mujhko shikastagi ka qalaq der tak raha
- नज़र की फ़त्ह कभी क़ल्ब की शिकस्त लगे
- nazar ki fath kabhi qalb ki shikast lage
- हम चटानों की तरह साहिल पे ढाले जाएँगे
- hum chaTanon ki tarah sahil pe Dhaale jaenge
- ये शहर के बासी क्या जानें क्या रूप है गाँव के पनघट का
- ye shahr ke basi kya jaanen kya rup hai ganw ke panghaT ka
- उदास काग़ज़ी मौसम में रंग ओ बू रख दे
- udas kaghzi mausam mein rang o bu rakh de
- रहीन-ए-आस रही है न महव-ए-यास रही
- rahin-e-as rahi hai na mahw-e-yas rahi
- तमन्ना बन गई है माया-ए-इल्ज़ाम क्या होगा
- tamanna ban gai hai maya-e-ilzam kya hoga
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ बेकल उत्साही की ग़ज़लें हैं — ‘दिमाग़ अर्श पे है ख़ुद ज़मीं पे चलते हैं’, ‘dimagh arsh pe hai KHud zamin pe chalte hain’, ‘उधर वो हाथों के पत्थर बदलते रहते हैं’, ‘udhar wo hathon ke patthar badalte rahte hain’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।