बहादुर शाह ज़फ़र (Bahadur Shah Zafar) का मूल नाम मिर्ज़ा अबू ज़फ़र सिराजुद्दीन मुहम्मद था। उनका जन्म 1775 में दिल्ली के ऐतिहासिक लाल क़िले में हुआ। वे मुग़ल सल्तनत के अंतिम बादशाह होने के साथ-साथ उर्दू अदब के युगप्रवर्तक और संवेदनशील क्लासिकल शायर थे। शायरी की तालीम उन्होंने मीरज़ा नसीर और बाद में उस्ताद-ए-शहंशाह शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ से प्राप्त की, जबकि मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ ग़ालिब भी उनके दरबार व साहित्यिक मंडली के शीर्ष हस्ताक्षर रहे। शायरी के अतिरिक्त ज़फ़र को सूफ़ी दर्शन, संगीत और ख़ताती (सुलेख कला) में भी विशेष महारत हासिल थी।
ज़फ़र की ग़ज़लों में इश्क़, विरह, सूफ़ी तसव्वुफ़ और सल्तनत के उजड़ने का गहरा दर्द झलकता है। उनकी मुकम्मल रचनाएँ ‘कुल्लियात-ए-ज़फ़र’ में संकलित हैं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें बंदी बनाकर रंगून (म्यांमार) निर्वासित कर दिया, जहाँ 1862 में उन्होंने अंतिम सांस ली। अपने वतन और दिल्ली से बिछड़ने की टीस उनकी शायरी के हर शेर में शिद्दत से महसूस होती है।
बहादुर शाह ज़फ़र की प्रसिद्ध ग़ज़लें (Bahadur Shah Zafar Best Ghazals)
- बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
- लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में
- भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ
- या मुझे अफ़सर-ए-शाहाना बनाया होता
- नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा
- मोहब्बत चाहिए बाहम हमें भी हो तुम्हें भी हो
- हम ये तो नहीं कहते कि ग़म कह नहीं सकते
- बहादुर शाह ज़फ़र की चुनिंदा ग़ज़लें व अश'आर
- जिगर के टुकड़े हुए जल के दिल कबाब हुआ
- देखो इंसाँ ख़ाक का पुतला बना क्या चीज़ है
- इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल
- शमशीर-ए-बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी ही
- काफ़िर तुझे अल्लाह ने सूरत तो परी दी
- क्या कुछ न किया और हैं क्या कुछ नहीं करते
- होते होते चश्म से आज अश्क-बारी रह गई
- निबाह बात का उस हीला-गर से कुछ न हुआ
- न दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए ना ताज-ए-शाहाना
- वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले
- हम ने तिरी ख़ातिर से दिल-ए-ज़ार भी छोड़ा
- इश्क़ तो मुश्किल है ऐ दिल कौन कहता सहल है
- मैं हूँ आसी कि पुर-ख़ता कुछ हूँ
- टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच
- गालियाँ तनख़्वाह ठहरी है अगर बट जाएगी
- वाँ रसाई नहीं तो फिर क्या है
- ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो
- देख दिल को मिरे ओ काफ़िर-ए-बे-पीर न तोड़
- हिज्र के हाथ से अब ख़ाक पड़े जीने में
- गई यक-ब-यक जो हवा पलट नहीं दिल को मेरे क़रार है
- न उस का भेद यारी से न 'अय्यारी से हाथ आया
- ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तिरे ऐ मेहर-ए-तलअत खुल गई
- है दिल को जो याद-ए-फ़लक-ए-पीर किसी की
- जब कभी दरिया में होते साया-अफ़गन आप हैं
- Baat Karni Mujhe Mushkil Kabhi Aisi To Na Thi
- Lagta Nahin Hai Dil Mera Ujde Dayar Mein
- Bhari Hai Dil Mein Jo Hasrat Kahun To Kis Se Kahun
- Ya Mujhe Afsar-e-Shahana Banaya Hota
- Nahin Ishq Mein Is Ka To Ranj Hamein
- Mohabbat Chahiye Baham Hamein Bhi Ho Tumhein Bhi Ho
- Hum Ye To Nahin Kahte Ki Gham Kah Nahin Sakte
- Jigar Ke Tukde Hue Jal Ke Dil Kabab Hua
- Dekho Insan Khak Ka Putla Bana Kya Chiz Hai
- Itna Na Apne Jame Se Bahar Nikal Ke Chal
- Shamshir-e-Barhana Mang Ghazab
- Kafir Tujhe Allah Ne Surat To Pari Di
- Kya Kuchh Na Kiya Aur Hain Kya Kuchh Nahin Karte
- Hote Hote Chashm Se Aaj Ashk-bari Rah Gai
- Nibah Baat Ka Us Hila-gar Se Kuchh Na Hua
- Na Darweshon Ka Khirqa Chahiye Na Taj-e-Shahana
- Wo Sau Sau Atkhaton Se Ghar Se Bahar Do Qadam Nikle
- Humne Teri Khatir Se Dil-e-Zar Bhi Chhoda
- Ishq To Mushkil Hai Ai Dil Kaun Kahta Sahl Hai
- Main Hun Aasi Ki Pur-khata Kuchh Hun
- Tukde Nahin Hain Aansuon Mein Dil Ke Chaar Panch
- Galiyan Tankhwah Thahri Hai Agar Bat Jaegi
- Wan Rasai Nahin To Phir Kya Hai
- Ye Qissa Wo Nahin Tum Jis Ko Qissa-khwan Se Suno
- Dekh Dil Ko Mere O Kafir-e-Be-Pir Na Tod
- Hijr Ke Hath Se Ab Khak Pade Jine Mein
- Gai Yak-ba-yak Jo Hawa Palat
- Na Us Ka Bhed Yari Se Na Ayyari Se Hath Aaya
- Zulf Jo Rukh Par Tere Ai Mehr-e-Talat Khul Gai
- Hai Dil Ko Jo Yaad-e-Falak-e-Pir Kisi Ki
- Jab Kabhi Dariya Mein Hote Saya-afgan Aap Hain
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ बहादुर शाह ज़फ़र की ग़ज़लें हैं — ‘बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी’, ‘लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में’, ‘भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ’, ‘या मुझे अफ़सर-ए-शाहाना बनाया होता’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।