आरज़ू लखनवी (1873–1951) उर्दू के प्रसिद्ध शायर और गीतकार थे। उनका मूल नाम मोहम्मद हुसैन और तख़ल्लुस ‘आरज़ू’ था। लखनऊ में जन्मे आरज़ू ने कम उम्र में ही शायरी शुरू कर दी थी और बाद में जलाल लखनवी के शागिर्द बने। ग़ज़ल, गीत और मर्सिये के साथ उन्होंने मसनवी, रुबाई, नात, क़सीदा और अन्य काव्य-विधाओं में भी लिखा। छंदशास्त्र पर उनकी अच्छी पकड़ थी और अपने समय में वे उस्ताद शायर के रूप में प्रतिष्ठित हुए।‘फ़ुग़ान-ए-आरज़ू’, ‘जहान-ए-आरज़ू’, ‘निशान-ए-आरज़ू’ और ‘सुरीली बाँसुरी’ उनकी चर्चित कृतियों में हैं। 1942 में वे बंबई चले गए, जहाँ फिल्मों के लिए गीत और संवाद भी लिखे। बाद में पाकिस्तान चले गए और कराची में रेडियो पाकिस्तान से जुड़े। 16 अप्रैल 1951 को कराची में उनका निधन हुआ।
रस उन आंखों का है कहने को जरा सा पानी आरजू लखनवी
रस उन आँखों का है कहने को ज़रा सा पानी
सैंकड़ों डूब गए फिर भी है इतना पानी
आँख से बह नहीं सकता है भरम का पानी
फूट भी जाएगा छाला तो न देगा पानी
चाह में पाऊँ कहाँ आस का मीठा पानी
प्यास भड़की हुई है और नहीं मिलता पानी
दिल से लौका जो उठा आँख से टपका पानी
आग से आज निकलते हुए देखा पानी
किस ने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी
झूम कर आई घटा टूट के बरसा पानी
फैलती धूप का है रूप लड़कपन का उठान
दोपहर ढलते ही उतरेगा ये चढ़ता पानी
टिकटिकी बाँधे वो तकते हैं मैं इस घात में हूँ
कहीं खाने लगे चक्कर न ये ठहरा पानी
कोई मतवाली घटा थी कि जवानी की उमंग
जी बहा ले गया बरसात का पहला पानी
हाथ जल जाएगा छाला न कलेजे का छुओ
आग मुट्ठी में दबी है न समझना पानी
रस ही रस जिन में है फिर सैल ज़रा सी भी नहीं
माँगता है कहीं उन आँखों का मारा पानी
न सता उस को जो चुप रह के भरे ठंडी साँस
ये हवा करती है पत्थर का कलेजा पानी
ये पसीना वही आँसू हैं जो पी जाते थे हम
'आरज़ू' लो वो खुला भेद वो टूटा पानी
आरजू लखनवी की अन्य लोकप्रिय गजलें
- जिन रातों में नींद उड़ जाती है क्या क़हर की रातें होती हैं
- आराम के थे साथी क्या क्या जब वक़्त पड़ा तो कोई नहीं
- अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ' भी थी परवाना भी
- आँख से दिल में आने वाला
- वो सर-ए-बाम कब नहीं आता
- भोले बन कर हाल न पूछो बहते हैं अश्क तो बहने दो
- मासूम नज़र का भोला-पन ललचा के लुभाना क्या जाने
- गोरे गोरे चाँद से मुँह पर काली काली आँखें हैं
- आज बे-आप हो गए हम भी
- तक़दीर पे शाकिर रह कर भी ये कौन कहे तदबीर न कर
- क्यूँ किसी रह-रौ से पूछूँ अपनी मंज़िल का पता
- क़ुर्बत बढ़ा बढ़ा कर बे-ख़ुद बना रहे हैं
- वअ'दा सच्चा है कि झूटा मुझे मालूम न था
- दिल दे रहा था जो उसे बे-दिल बना दिया
- नाले मजबूरों के ख़ाली नहीं जाने वाले
- हुस्न से शरह हुई इश्क़ के अफ़्साने की
- पानी में आग ध्यान से तेरे भड़क गई
- आने में झिझक मिलने में हया तुम और कहीं हम और कहीं
- नज़र उस चश्म पे है जाम लिए बैठा हूँ
- मिरी निगाह कहाँ दीद-ए-हुस्न-ए-यार कहाँ
- करम उन का ख़ुद है बढ़ कर मिरी हद्द-ए-इल्तिजा से
- हर साँस है इक नग़्मा हर नग़्मा है मस्ताना
- किस मस्त अदा से आँख लड़ी मतवाला बना लहरा के गिरा
- दूर थे होश-ओ-हवास अपने से भी बेगाना था
- जहाँ कि है जुर्म एक निगाह करना
- ये दास्तान-ए-दिल है क्या हो अदा ज़बाँ से
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ आरजू लखनवी की ग़ज़लें हैं — ‘जिन रातों में नींद उड़ जाती है क्या क़हर की रातें होती हैं’, ‘आराम के थे साथी क्या क्या जब वक़्त पड़ा तो कोई नहीं’, ‘अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ' भी थी परवाना भी’, ‘आँख से दिल में आने वाला’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।