मौलाना हारून ‘अना’ क़ासमी उर्दू अदब की दुनिया में एक प्रतिष्ठित शायर और गज़लकार हैं। आपका जन्म 28 फरवरी 1966 को मध्य प्रदेश के छतरपुर में हुआ था। आपके पिता का नाम हाजी मुहम्मद जमील निज़ामी और माता का नाम मरियम खातून है। मौलाना हारून ने अपनी उच्च धार्मिक और साहित्यिक शिक्षा देश के सर्वोच्च संस्थानों से पूरी की है; उन्होंने नदवतुल-उलमा, लखनऊ से आलिमियत का कोर्स किया और वर्ष 1989 में दारूल-उलूम देवबन्द से फ़ज़ीलत की डिग्री हासिल की।
लेखन विधाओं में आप मुख्य रूप से ग़ज़ल एवं नज़्म पर अपनी कलम चलाते हैं। आपकी साहित्यिक उपलब्धियों में दिल्ली के प्रसिद्ध अयन प्रकाशन से प्रकाशित उनका ग़ज़ल संग्रह ‘हवाओं के साज़ पर’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसके अलावा देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ निरंतर प्रकाशित होती रही हैं और उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के कई बड़े मुशायरों व मंचों पर सफल काव्य-पाठ (रचनापाठ) किया है। कला और साहित्य में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें नगरपालिका छतरपुर द्वारा 'श्रेष्ठ शायर सम्मान' से भी नवाजा जा चुका है।
वर्तमान में वे आकाशवाणी तिराहा, छतरपुर (म.प्र.) स्थित 'हेल्प लाइन कम्प्यूटर सेल्स' के माध्यम से साहित्य और समाज से जुड़े हुए हैं।
मौलाना हारून 'अना' क़ासमी की लोकप्रिय ग़ज़लें (Popular Ghazals of Maulana Haroon Ana Qasmi)
- कैसा रिश्ता है इस मकान के साथ
- कुछ चलेगा जनाब, कुछ भी नहीं
- छू जाए दिल को ऐसा कोई फ़न अभी कहाँ
- उससे कहना कि कमाई के न चक्कर में रहे
- बहुत वीरान लगता है, तिरी चिलमन का सन्नाटा
- वो अभी पूरा नहीं था हाँ मगर अच्छा लगा
- तेरी इन आंखों के इशारे पागल हैं
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ अना क़ासमी की ग़ज़लें हैं — ‘कैसा रिश्ता है इस मकान के साथ’, ‘कुछ चलेगा जनाब, कुछ भी नहीं’, ‘छू जाए दिल को ऐसा कोई फ़न अभी कहाँ’, ‘उससे कहना कि कमाई के न चक्कर में रहे’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।