अमीर मीनाई (Ameer Minai) (1829–1900) उर्दू और फ़ारसी के मूर्धन्य क्लासिकल शायर, लेखक, भाषाविद् और कोशकार थे। उनका जन्म लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद वे रामपुर रियासत चले गए, जहाँ नवाब के दरबार से जुड़कर उन्होंने दशकों तक उर्दू अदब की सेवा की। वे अपनी कालजयी ग़ज़लों और नातिया शायरी के लिए विशेष रूप से विख्यात हैं। उनकी मशहूर ग़ज़ल “सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता” आज भी भारतीय उपमहाद्वीप में बेहद लोकप्रिय है। उनका निधन 13 अक्टूबर 1900 को हैदराबाद में हुआ।
तुन्द मै और ऐसे कमसिन के लिये / अमीर मीनाई ग़ज़ल / रचना
तुन्द मय और ऐसे कमसिन के लिये
साक़िया हल्की-सी ला इन के लिये
मुझ से रुख़्सत हो मेरा अहद-ए-शबाब
या ख़ुदा रखना न उस दिन के लिये
है जवानी ख़ुद जवानी का सिंगार
सादगी गहना है इस सिन के लिये
सब हसीं हैं ज़ाहिदों को नापसन्द
अब कोई हूर आयेगी इन के लिये
वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिये
सारी दुनिया के हैं वो मेरे सिवा
मैंने दुनिया छोड़ दी जिन के लिये
लाश पर इबरत ये कहती है 'अमीर'
आये थे दुनिया में इस दिन के लिये
अमीर मीनाई की प्रसिद्ध ग़ज़लें एवं शायरी (Ameer Minai Ghazal & Poetry)
- तुन्द मै और ऐसे कमसिन के लिये
- जब से बुलबुल तूने दो तिनके लिये
- कह रही है हश्र में वो आँख शर्माई हुई
- सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता
- इश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं गुज़रने वाले
- हँस के फ़रमाते हैं वो देख कर हालत मेरी
- अमीर मीनाई की चुनिंदा ग़ज़लें (संग्रह)
- बन्दा नवाज़ियों पे खु़दा-ए-करीम था
- झोंका इधर न आये नसीम-ए-बहार का
- अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है
- है दिल को शौक़ उस बुत-ए-क़ातिल की दीद का
- अमीर लाख इधर से उधर ज़माना हुआ
- क़ैदी जो था वो दिल से ख़रीदार हो गया
- फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझको रात भर रक्खा
- ना शौक़ ए वस्ल का दावा
- ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो
- कहा जो मैंने कि यूसुफ़ को ये हिजाब न था
- फुटकर शेर व अशआर
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ अमीर मीनाई की ग़ज़लें हैं — ‘तुन्द मै और ऐसे कमसिन के लिये’, ‘जब से बुलबुल तूने दो तिनके लिये’, ‘कह रही है हश्र में वो आँख शर्माई हुई’, ‘सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।