अख़्तर शीरानी (Akhtar Shirani) (1905–1948) का असली नाम मुहम्मद दाऊद ख़ान था। उनका जन्म राजस्थान के ऐतिहासिक शहर टोंक में हुआ था। बाद में वे लाहौर चले गए, जहाँ उन्होंने ओरिएंटल कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की और मौलाना ताजवर नजीबाबादी की शागिर्दी में अपनी शायरी को निखारा।
उर्दू अदब में अख़्तर शीरानी को ‘शायर-ए-शबाब’ और रोमानी शायरी का बेताज बादशाह कहा जाता है। उन्होंने पारंपरिक ग़ज़ल और आधुनिक नज़्म दोनों में रूमानी जज़्बात, हुस्न और फ़ितरत की ख़ूबसूरती को नए आयाम दिए। वे ‘इंतिख़ाब’, ‘बहारिस्तान’, ‘ख़यालिस्तान’ और ‘रोमां’ जैसी मशहूर साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक रहे। ‘ऐ इश्क़ कहीं ले चल’, ‘ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर’ और ‘ओ देश से आने वाले बता’ उनकी अमर रचनाओं में शामिल हैं। 9 सितंबर 1948 को लाहौर में उनका इंतिक़ाल हुआ।
अख़्तर शीरानी की प्रसिद्ध ग़ज़लें (Selected Ghazals of Akhtar Shirani)
- वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें : अख़्तर शीरानी
- यूँ तो किस फूल से रंगत न गई बू न गई : अख़्तर शीरानी
- मोहब्बत की दुनिया में मशहूर कर दूँ : अख़्तर शीरानी
- मिरी आँखों से ज़ाहिर ख़ूँ-फ़िशानी अब भी होती है : अख़्तर शीरानी
- तमन्नाओं को ज़िंदा आरज़ूओं को जवाँ कर लूँ : अख़्तर शीरानी
- झूम कर बदली उठी और छा गई : अख़्तर शीरानी
- कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता : अख़्तर शीरानी
- किस को देखा है ये हुआ क्या है : अख़्तर शीरानी
- किस की आँखों का लिए दिल पे असर जाते हैं : अख़्तर शीरानी
- काम आ सकीं न अपनी वफ़ाएँ तो क्या करें : अख़्तर शीरानी
- ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए : अख़्तर शीरानी
- आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या : अख़्तर शीरानी
- उम्र भर की तल्ख़ बेदारी का सामाँ हो गईं : अख़्तर शीरानी
इस पन्ने की ग़ज़लें
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