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आदिल मंसूरी की ग़ज़लें: Adil Mansuri Ghazal in Hindi

2024-11-11 · ग़ज़ल / Ghazal

आदिल मंसूरी (Adil Mansuri) (1936–2008) आधुनिक गुजराती और उर्दू अदब के प्रतिष्ठित शायर, नाटककार एवं सुलेखकार (calligrapher) थे। उनका मूल नाम फ़रीद मोहम्मद ग़ुलाम नबी मंसूरी था और उनका जन्म अहमदाबाद, गुजरात में हुआ था। आधुनिक गुजराती ग़ज़ल को नए बिंब, ताज़गी और अनूठी शैली प्रदान करने वाले आदिल मंसूरी ने उर्दू और हिंदी शायरी में भी यादगार रचनाएँ दीं। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में वलांक, पगरव, सतत और ग़ज़लना आयनाघरमा प्रमुख हैं। यहाँ आदिल मंसूरी की लोकप्रिय ग़ज़लों, अश'आर और शायरी का संपूर्ण संग्रह क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत है।

एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal

एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया
एक मुश्त-ए-ख़ाक जो बिखरी तो सहरा कर दिया

मेरे टूटे हौसले के पर निकलते देख कर
उस ने दीवारों को अपनी और ऊँचा कर दिया

वारदात-ए-क़ल्ब लिक्खी हम ने फ़र्ज़ी नाम से
और हाथों-हाथ उस को ख़ुद ही ले जा कर दिया

उस की नाराज़ी का सूरज जब सवा नेज़े पे था
अपने हर्फ़-ए-इज्ज़ ही ने सर पे साया कर दिया

दुनिया भर की ख़ाक कोई छानता फिरता है अब
आप ने दर से उठा कर कैसा रुस्वा कर दिया

अब न कोई ख़ौफ़ दिल में और न आँखों में उम्मीद
तू ने मर्ग-ए-ना-गहाँ बीमार अच्छा कर दिया

भूल जा ये कल तिरे नक़्श-ए-क़दम थे चाँद पर
देख उन हाथों को किस ने आज कासा कर दिया

हम तो कहने जा रहे थे हम्ज़ा-ये-वस्सलाम
बीच में उस ने अचानक नून-ग़ुन्ना कर दिया

हम को गाली के लिए भी लब हिला सकते नहीं
ग़ैर को बोसा दिया तो मुँह से दिखला कर दिया

तीरगी की भी कोई हद होती है आख़िर मियाँ
सुर्ख़ परचम को जला कर ही उजाला कर दिया

बज़्म में अहल-ए-सुख़न तक़्ती फ़रमाते रहे
और हम ने अपने दिल का बोझ हल्का कर दिया

जाने किस के मुंतज़िर बैठे हैं झाड़ू फेर कर
दिल से हर ख़्वाहिश को 'आदिल' हम ने चलता कर दिया

आदिल मंसूरी की लोकप्रिय ग़ज़लें (Adil Mansuri Ghazal Collection)

इस पन्ने की ग़ज़लें

यहाँ आदिल मंसूरी की ग़ज़लें हैं — ‘एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया’, ‘इबलाग़ के बदन में तजस्सुस का सिलसिला’, ‘आशिक़ थे शहर में जो पुराने शराब के’, ‘अब टूटने ही वाला है तन्हाई का हिसार’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।

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