आदिल मंसूरी (Adil Mansuri) (1936–2008) आधुनिक गुजराती और उर्दू अदब के प्रतिष्ठित शायर, नाटककार एवं सुलेखकार (calligrapher) थे। उनका मूल नाम फ़रीद मोहम्मद ग़ुलाम नबी मंसूरी था और उनका जन्म अहमदाबाद, गुजरात में हुआ था। आधुनिक गुजराती ग़ज़ल को नए बिंब, ताज़गी और अनूठी शैली प्रदान करने वाले आदिल मंसूरी ने उर्दू और हिंदी शायरी में भी यादगार रचनाएँ दीं। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में वलांक, पगरव, सतत और ग़ज़लना आयनाघरमा प्रमुख हैं। यहाँ आदिल मंसूरी की लोकप्रिय ग़ज़लों, अश'आर और शायरी का संपूर्ण संग्रह क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत है।
एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया आदिल मंसूरी ग़ज़ल / Adil Mansuri Ghazal
एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया
एक मुश्त-ए-ख़ाक जो बिखरी तो सहरा कर दिया
मेरे टूटे हौसले के पर निकलते देख कर
उस ने दीवारों को अपनी और ऊँचा कर दिया
वारदात-ए-क़ल्ब लिक्खी हम ने फ़र्ज़ी नाम से
और हाथों-हाथ उस को ख़ुद ही ले जा कर दिया
उस की नाराज़ी का सूरज जब सवा नेज़े पे था
अपने हर्फ़-ए-इज्ज़ ही ने सर पे साया कर दिया
दुनिया भर की ख़ाक कोई छानता फिरता है अब
आप ने दर से उठा कर कैसा रुस्वा कर दिया
अब न कोई ख़ौफ़ दिल में और न आँखों में उम्मीद
तू ने मर्ग-ए-ना-गहाँ बीमार अच्छा कर दिया
भूल जा ये कल तिरे नक़्श-ए-क़दम थे चाँद पर
देख उन हाथों को किस ने आज कासा कर दिया
हम तो कहने जा रहे थे हम्ज़ा-ये-वस्सलाम
बीच में उस ने अचानक नून-ग़ुन्ना कर दिया
हम को गाली के लिए भी लब हिला सकते नहीं
ग़ैर को बोसा दिया तो मुँह से दिखला कर दिया
तीरगी की भी कोई हद होती है आख़िर मियाँ
सुर्ख़ परचम को जला कर ही उजाला कर दिया
बज़्म में अहल-ए-सुख़न तक़्ती फ़रमाते रहे
और हम ने अपने दिल का बोझ हल्का कर दिया
जाने किस के मुंतज़िर बैठे हैं झाड़ू फेर कर
दिल से हर ख़्वाहिश को 'आदिल' हम ने चलता कर दिया
आदिल मंसूरी की लोकप्रिय ग़ज़लें (Adil Mansuri Ghazal Collection)
- एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया
- इबलाग़ के बदन में तजस्सुस का सिलसिला
- आशिक़ थे शहर में जो पुराने शराब के
- अब टूटने ही वाला है तन्हाई का हिसार
- कौन था वो ख़्वाब के मल्बूस में लिपटा हुआ
- गाँठी है उस ने दोस्ती इक पेश-इमाम से
- घूम रहा था एक शख़्स रात के ख़ारज़ार में
- आदिल मंसूरी की चुनिंदा शायरी : Adil Mansuri Ghazal
- चारों तरफ़ से मौत ने घेरा है ज़ीस्त को
- चेहरे पे चमचमाती हुई धूप मर गई
- ज़मीं छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा
- दरवाज़ा बंद देख के मेरे मकान का
- जीता है सिर्फ़ तेरे लिए कौन मर के देख
- न कोई रोक सका ख़्वाब के सफ़ीरों को
- पानी को पत्थर कहते हैं
- फैले हुए हैं शहर में साए निढाल से
- बदन पर नई फ़स्ल आने लगी
- बिस्मिल के तड़पने की अदाओं में नशा था
- मुझे पसंद नहीं ऐसे कारोबार में हूँ
- ये फैलती शिकस्तगी एहसास की तरफ़
- वो तुम तक कैसे आता
- वो बरसात की शब वो पिछ्ला पहर
- सड़कों पर सूरज उतरा
- साँस की आँच ज़रा तेज़ करो
- सोए हुए पलंग के साए जगा गया
- हज का सफ़र है इस में कोई साथ भी तो हो
- हर ख़्वाब काली रात के साँचे में ढाल कर
- हाथ में आफ़्ताब पिघला कर
- हुआ ख़त्म दरिया तो सहरा लगा
- होने को यूँ तो शहर में अपना मकान था
इस पन्ने की ग़ज़लें
यहाँ आदिल मंसूरी की ग़ज़लें हैं — ‘एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया’, ‘इबलाग़ के बदन में तजस्सुस का सिलसिला’, ‘आशिक़ थे शहर में जो पुराने शराब के’, ‘अब टूटने ही वाला है तन्हाई का हिसार’ जैसी ग़ज़लें, हर एक का लिंक ऊपर दिया है।