परिचय
ठाकुर गोपालशरण सिंह (1891–1960) द्विवेदी युग के मूर्धन्य राष्ट्रीय कवि और खड़ी बोली व ब्रजभाषा के सिद्धहस्त रचनाकार थे, जिनका संबंध रीवा (मध्य प्रदेश) से था। उनकी कविताओं में भारतीय संस्कृति, नारी-महिमा, राष्ट्रप्रेम और प्रकृति सौंदर्य का अत्यंत सजीव व मर्मस्पर्शी चित्रण मिलता है। 'मानवी', 'माधवी', 'संचिता', 'ज्योतिष्मती' और 'कादम्बिनी' उनके प्रमुख काव्य-संग्रहों में गिने जाते हैं। साहित्य के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट और विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित ‘कविरत्न’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
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गोपालशरण सिंह के गीत कविता | Gopal Sharan Singh Geet Kavita
- बादल / गोपालशरण सिंह
- अनंत उल्लास / गोपालशरण सिंह
- अकेला / गोपालशरण सिंह
- प्रेम / गोपालशरण सिंह
- दुलहिन / गोपालशरण सिंह
- अनाथ / गोपालशरण सिंह
- देव-दासी / गोपालशरण सिंह
- अंतिम प्रार्थना / गोपालशरण सिंह
- संसार / गोपालशरण सिंह
- तुलसीदास / गोपालशरण सिंह
- मातृ-महिमा / गोपालशरण सिंह
- मुस्कान / गोपालशरण सिंह
- चाँदनी / गोपालशरण सिंह
- ग्राम-वासिनी / गोपालशरण सिंह
- भिखारिनी / गोपालशरण सिंह
- वारांगना / गोपालशरण सिंह
- अनारकली / गोपालशरण सिंह
- विधवा / गोपालशरण सिंह
- अनंत यौवन / गोपालशरण सिंह
- सीता / गोपालशरण सिंह
- भारत / गोपालशरण सिंह