रतन पंडोरवी (वास्तविक नाम रलाराम) का जन्म 07 जुलाई 1907 को ग्राम पंडोरी (बटाला, गुरदासपुर, पंजाब) में हुआ था। वे पंजाब के प्रतिष्ठित उस्ताद शायरों में गिने जाते हैं। रतन साहब ने शायरी की बारीकियां मशहूर शायर दिल शाहजहाँपुरी और जोश मलसियानी से सीखीं।
उन्हें पंजाब सरकार द्वारा सर्वोच्च "शिरोमणि साहित्यकार अवार्ड" से सम्मानित किया गया था। उन्होंने कुल 23 पुस्तकों की रचना की, जिनमें 9 काव्य-संग्रह और 14 गद्य कृतियाँ शामिल हैं। जीवन का लंबा समय पंडोरी के एक शिव मंदिर में फ़क़ीर की तरह बिताने के बाद 04 नवंबर 1990 को पठानकोट में उनका देहावसान हुआ।
रतन पंडोरवी की प्रसिद्ध ग़ज़लें (Popular Ghazals of Ratan Pandorvi)
- जन्नत की तमन्ना में कोई मरता है
- क्या बात है हर बात का लुत्फ़ आता है
- आफ़ात का गहवारा है हस्ती मेरी
- अक़्ल वाले क्या समझ सकते हैं दीवाने की बात
- क्या तिरी दरिया दिली है ऐ-खुदा मेरे लिये
- ख़्वाब ही में रुख़-ए-पुर-नूर दिखाए कोई
- जुदा वो होते तो हम उन की जुस्तुजू करते
- पहुँचे न जो मुराद को वो मुद्दआ हूँ मैं
- मौजों ने हाथ दे के उभारा कभी कभी
जन्नत की तमन्ना में कोई मरता है / रतन पंडोरवी
जन्नत की तमन्ना में कोई मरता है
दोज़ख की सज़ाओं से कोई डरता है।
बढ़ जाता है जो इन की हदों से आगे
दीदार हक़ीक़त का वही करता है।
आराम को आलाम का मसदर पाया
आलाम में आराम को मुज़्मर पाया
आग़ाज़ में अंजाम की सूरत देखी
अंजाम में आग़ाज़ का रहबर पाया।
पीने की तमन्ना है पिला दे साक़ी
दीवानए-हुशियार बना दे साक़ी
बढ़ जाये नज़र कोन-ओ-मकां से आगे
लाहूत के अनवार दिखा दे साक़ी।
कहते हैं कि हर फेल का फ़ाइल तू है
मक़तूल अगर कोई है क़ातिल तू है
या रब ये सज़ा और जज़ा क्या मानी
जब दहर में हर अमल का आमिल तू है
हर ज़र्रा को ख़ुर्शीदे-मुनव्वर समझो
हर क़तरए-नाचीज़ को साग़र समझो
किस्मत की हक़ीक़त जो समझनी हो 'रतन'
आमाले-गुज़श्ता को मुक़द्दर समझो
ज़र्रा पे नज़र डाली तो सहरा पाया
क़तरे में निहां जल्वए-दरिया पाया
हर जुज़्व में है कुल की तजल्ली मस्तूर
बन्दे की जो की खोज तो मैला पाया।
उल्फ़त की हिकायात को धोखा समझो
हर रिश्ते को टूटा हुआ रिश्ता समझो।
हालाते-ज़माना ये बताते हैं 'रतन'
अपने को भी दुनिया में न अपना समझो।
ज़ाहिर की महब्बत को फ़साना कहिये
अल्फाज़े-मुलाइम को बहाना कहिये।
जब जिस्म भी अपना नहीं अपना हरगिज़
किस मुंह से यगाने को यगाना कहिये।
ज़ाहिर में तो तस्वीरे-फ़ना है बंदा
बातिन में मगर हुस्ने-बक़ा है बंदा
खुल जाये अगर इस की हक़ीक़त इस लर
बस फिर तो 'रतन' शाने-ख़ुदा है बंदा।
हर हाल में मज़बूर हैं दुनिया वाले
ऐसे में भी मग़रूर हैं दुनिया वाले
दुश्वार है दुश्वार हुसूले-मक़सद
मंज़िल से बहुत दूर हैं दुनिया वाले।
क्या बात है हर बात का लुत्फ़ आता है / रतन पंडोरवी
क्या बात है हर बात का लुत्फ़ आता है
रोता हूँ तो बरसात का लुत्फ़ आता है।
होती है तसव्वुर में भी उन से बातें
फ़ुर्क़त में मुलाक़ात का लुत्फ़ आता है।
हर शय में वही जाने-तमन्ना देखा
पर्दों में भी सौ बार हुवैदा देखा
उस आंख को हम आंख समझते हैं 'रतन'
जिस ने वो नज़र न आने वाला देखा।
दर अस्ल मिरे होने ने खोया मुझ को
दर अस्ल उभरने ने डुबोया मुझ को
इसियां की क़ियामत को कसाफत समझा
देखा तो इसी मैल ने धोया मुझ को।
क़ाबा की ज़रूरत है न बुतखाने की
मूसा की न कुछ तूर के अफ़साने की
इरफाने-हक़ीक़त की तजल्ली के लिए
हिम्मत मुझे दरकार है परवाने की।
मरने से हर इंसान को डरते देखा
हर वक़्त दुआ जीने की करते देखा।
जीना भी तो आसान नहीं है कोई
जीने के लिये मौत को मरते देखा।
हर जुज़्व में कुल जलवा-नुमा मिलता है
बन्दे में निहां नूरे-ख़ुदा मिलता है
देखे भी कोई गौर से आंखों से 'रतन'
आग़ाज़ में अंजाम छुपा मिलता है।
आफ़ात का गहवारा है हस्ती मेरी / रतन पंडोरवी
आफ़ात का गहवारा है हस्ती मेरी
वीराने से वीरान है बस्ती मेरी।
इस पर भी 'रतन' दिल को सुकूँ हासिल है
हैरान हैं सब देख के हस्ती मेरी।
आबाद है अनवार की दुनिया दिल में
बैठा है कोई दिलबरे-राना दिल में
देखा है 'रतन' चश्मे-हक़ीक़त बीं ने
रानाईए-मस्तूर का जल्वा दिल में।
मशहूर ज़माने में है बख़्शिश तेरी
हर शाह-ओ-गदा पर है नवाज़िश तेरी
अब अपने 'रतन' पर भी करम कर या रब
करता है दिल-ओ-जां परस्तिश तेरी
हर दर्द का हर दुख का मुदावा तू है
बे यार का बे कस का सहारा तू है
किस दर पे बनूँ जाके सवाली या रब
जब सब के नसीबा का नसीबा तू है
अक़्ल वाले क्या समझ सकते हैं दीवाने की बात / रतन पंडोरवी
अक़्ल वाले क्या समझ सकते हैं दीवाने की बात
अहले-गुलशन को कहां मालूम वीराने की बात।
इस क़दर दिलकश कहां होती है फर्जाने की बात
बात में करती है पैदा बात दीवाने की बात।
बात जब तय हो चुकी तो बात का मतलब ही क्या
बात में फिर बात करना है मुकर जाने की बात।
इसका ये मतलब क़ियामत अब दुबारा आएगी
कह गए हैं बातों-बातों में वो फिर आने की बात।
बात पहले ही न बन पाये तो वो बात और है
सख़्त हसरत नाक है बन कर बिगड़ जाने की बात।
दास्ताने-इश्क़ सुन कर हम पे ये उक़्दा खुला
दर हक़ीक़त इश्क़ है बे-मौत मर जाने की बात।
अब्र छाया है चमन है और साक़ी भी करीम
ऐसे आलम में न क्यों बन जाये पैमाने की बात।
इसमें भी कुछ बात है वो बात तक करते नहीं
सुन के लोगों की ज़बानी मेरे मर जाने की बात।
बात का ये हुस्न है दिल में उतर जाये 'रतन'
क्यों सुनाता है हमें दिल से उतर जाने की बात।
क्या तिरी दरिया दिली है ऐ-खुदा मेरे लिये / रतन पंडोरवी
क्या तिरी दरिया दिली है ऐ-खुदा मेरे लिये
हर क़यामत हर मुसीबत हर बला मेरे लिये।
हर जफ़ा हर जौर हर सख़्ती रवा है आप को
हर शिकायत हर गिला है ना-रवा मेरे लिये।
तेग़े-अबरू, तेग़े-चीं, तेग़े-नज़र, तेग़े-अदा
कितनी तलवारों का पहरा रख दिया मेरे लिये।
मुझको तेरे वास्ते बे-मौत मर जाना पड़ा
तू न लेकिन भूल कर भी जी सका मेरे लिये।
क्यों न मेरी बे-कसी पर रो उठे ख़ुद बे-कसी
हो गया हर आसरा बे-आसरा मेरे लिये।
जो तिरे कूचे में आया वो सलामत कब रहा
मर गयी है मह्ज मेरी ही क़ज़ा मेरे लिये।
हुस्न तेरा तेरी गुमराही का मूजब बन गया
इश्क़ मेरा बन गया है रहनुमा मेरे लिये।
हो सका कोई न मुझ उफ़्तादा पा का दस्तगीर
मेरी मुश्किल ही हुई मुश्किल कुशा मेरे लिये।
अब न जाऊंगा में उन के आस्तां पर ऐ-'रतन'
आस्तां से कम नहीं हर नक़्शे-पा मेरे लिये।
ख़्वाब ही में रुख़-ए-पुर-नूर दिखाए कोई / रतन पंडोरवी
ख़्वाब ही में रुख़-ए-पुर-नूर दिखाए कोई
ग़म में राहत का भी पहलू नज़र आए कोई।
सामने उस के दिल ओ जान ओ जिगर मैं रख दूँ
हाँ मगर हाथ में ख़ंजर तो उठाए कोई।
अपने ही घर में मिला ढूँड रहे थे जिस को
उस के पाने के लिए ख़ुद ही को पाए कोई।
आ गई काली घटा झूम के मय-ख़ाने पर
तौबा कहती है कि मुझ को भी पिलाए कोई।
जब नज़र आता है वो जान-ए-तमन्ना दिल में
किस तमन्ना को लिए तूर पे जाए कोई।
ज़िंदगी क्या है फ़क़त मौत का जाम-ए-रंगीं
हस्त होना है तो हस्ती को मिटाए कोई।
हुस्न है महज़ जफ़ा इश्क़ है तस्वीर-ए-वफ़ा
रब्त का कुछ तो सबब मुझ को बताए कोई।
जज़्बा-ए-शौक़ उसे खींच के लाएगा यहाँ
आ नहीं सकता तो सौ बार न आए कोई।
दिल में यूँ पर्दा-नशीं रहने से हासिल क्या है
लुत्फ़ तो जब है 'रतन' सामने आए कोई।
जुदा वो होते तो हम उन की जुस्तुजू करते / रतन पंडोरवी
जुदा वो होते तो हम उन की जुस्तुजू करते
अलग नहीं हैं तो फिर किस की आरज़ू करते।
मिला न हम को कभी अर्ज़-ए-हाल का मौक़ा
ज़बाँ न चलती तो आँखों से गुफ़्तुगू करते।
अगर ये जानते हम भी उन्हीं की सूरत हैं
कमाल-ए-शौक़ से अपनी ही जुस्तुजू करते।
जो ख़ाक चाक-ए-जिगर है तो पुर्ज़े पुर्ज़े दिल
जुनूँ के होश में किस किस को हम रफ़ू करते।
दिल-ए-हज़ीं के मकीं तू अगर सदा देता
तिरी तलाश कभी हम न कू-ब-कू करते।
कमाल-ए-जोश-ए-तलब का यही तक़ाज़ा है
हमें वो ढूँडते हम उन की जुस्तुजू करते।
नमाज़-ए-इश्क़ तुम्हारी क़ुबूल हो जाती
अगर शराब से तुम ऐ 'रतन' वज़ू करते।
पहुँचे न जो मुराद को वो मुद्दआ हूँ मैं / रतन पंडोरवी
पहुँचे न जो मुराद को वो मुद्दआ हूँ मैं
नाकामियों की राह में ख़ुद खो गया हूँ मैं।
कहते हैं जिस को हुस्न उसी का है नाम इश्क़
देखो मुझे ब-ग़ौर कि शान-ए-ख़ुदा हूँ मैं।
पर्दा उठा कि होश की दुनिया बदल गई
हैरान हूँ कि सामने क्या देखता हूँ मैं।
पैवंद ख़ाक हो के मिलें सर-बुलंदियाँ
दश्त-ए-जुनूँ में बन के बगूला उड़ा हूँ मैं।
वाइज़ के पंद-ओ-व'अज़ का इतना असर तो है
जो कुछ भी आज उस ने कहा पी गया हूँ मैं।
समझे मिरी हक़ीक़त-ए-हस्ती कोई 'रतन'
ऐन-ए-फ़ना की शक्ल में ऐन-ए-बक़ा हूँ मैं।
मौजों ने हाथ दे के उभारा कभी कभी / रतन पंडोरवी
मौजों ने हाथ दे के उभारा कभी कभी
पाया है डूब कर भी किनारा कभी कभी।
करती है तेग़-ए-यार इशारा कभी कभी
होता है इम्तिहान हमारा कभी कभी।
चमका है इश्क़ का भी सितारा कभी कभी
माँगा है हुस्न ने भी सहारा कभी कभी।
तालिब की शक्ल में मिली मतलूब की झलक
देखा है हम ने ये भी नज़ारा कभी कभी।
शोख़ी है हुस्न की ये है जज़्ब-ए-वफ़ा का सेहर
उस ने हमें सलाम गुज़ारा कभी कभी।
फ़रियाद-ए-ग़म रवा नहीं दस्तूर-ए-इश्क़ में
फिर भी लिया है उस का सहारा कभी कभी।
मुश्किल में दे सका न सहारा कोई 'रतन'
हाँ दर्द ने दिया है सहारा कभी कभी।

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