शरद जोशी का व्यंग्य पढ़ते हुए हँसी आती है, और फिर शर्म भी। 'अतिथि! तुम कब जाओगे' से लेकर 'लोकायुक्त' तक — उनकी हर रचना हमारे आस-पास के सिस्टम, अफसरशाही और समाज की आदतों पर चोट करती है। यहाँ उनके चुनिंदा व्यंग्य हैं।
| क्रम | रचना का शीर्षक |
|---|---|
| 1 | 1968-69 के वे दिन |
| 2 | अतिथि! तुम कब जाओगे |
| 3 | आलोचना |
| 4 | एक भूतपूर्व मंत्री से मुलाकात |
| 5 | जिसके हम मामा हैं |
| 6 | रेल यात्रा |
| 7 | लोकायुक्त |