इक दिन ख़ुद को अपने पास बिठाया हम ने
इक दिन ख़ुद को अपने पास बिठाया हम ने
पहले यार बनाया फिर समझाया हम ने
ख़ुद भी आख़िर-कार उन्ही वा'दों से बहले
जिन से सारी दुनिया को बहलाया हम ने
भीड़ ने यूँही रहबर मान लिया है वर्ना
अपने अलावा किस को घर पहुँचाया हम ने
मौत ने सारी रात हमारी नब्ज़ टटोली
ऐसा मरने का माहौल बनाया हम ने
घर से निकले चौक गए फिर पार्क में बैठे
तन्हाई को जगह जगह बिखराया हम ने
इन लम्हों में किस कि शिरकत कैसी शिरकत
उसे बुला कर अपना काम बढ़ाया हम ने
दुनिया के कच्चे रंगों का रोना रोया
फिर दुनिया पर अपना रंग जमाया हम ने
जब 'शारिक़' पहचान गए मंज़िल की हक़ीक़त
फिर रस्ते को रस्ते भर उलझाया हम ने
शारिक़ कैफ़ी के बारे में
शारिक़ कैफ़ी की ग़ज़ल में एक ठहरा हुआ सुर है। वे जल्दबाज़ी में बात नहीं कहते, और उनके शेर पढ़ते हुए लगता है जैसे कोई अपने ही मन से बात कर रहा हो।
ग़ज़ल को समझने के लिए दो शब्द जानना काफ़ी है। पहला मतला, यानी ग़ज़ल का पहला शेर, जिसके दोनों मिसरे काफ़िया में होते हैं। दूसरा रदीफ़, यानी वह शब्द जो हर शेर के आख़िर में दोहराया जाता है। जिस दिन आप इन दोनों को पहचानने लगेंगे, ग़ज़ल पढ़ने का मज़ा दोगुना हो जाएगा।
अगर आप उर्दू शायरी में नए हैं, तो घबराने की ज़रूरत नहीं। नीचे दी गई सूची से कोई भी ग़ज़ल चुनिए और पढ़ना शुरू कीजिए। धीरे-धीरे शब्द जाने-पहचाने लगेंगे और मतलब ख़ुद-ब-ख़ुद खुलता जाएगा।
शारिक़ कैफ़ी की सभी ग़ज़लें
- इक दिन ख़ुद को अपने पास बिठाया हम ने
- आइने का साथ प्यारा था कभी
- हमीं तक रह गया क़िस्सा हमारा
- झूट पर उस के भरोसा कर लिया
- कहीं न था वो दरिया जिस का साहिल था मैं
- अच्छा तो तुम ऐसे थे
- ये चुपके चुपके न थमने वाली हँसी तो देखो
- ये कुछ बदलाव सा अच्छा लगा है
- इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं
- वो दिन भी थे कि इन आँखों में इतनी हैरत थी
- सियाने थे मगर इतने नहीं हम
- जो कहता है कि दरिया देख आया
- एक मुद्दत हुई घर से निकले हुए
- ख़मोशी बस ख़मोशी थी इजाज़त अब हुई है
- ख़्वाब वैसे तो इक इनायत है
- रोना हो आसान हमारा
- लोग सह लेते थे हँस कर कभी बे-ज़ारी भी
इस पन्ने की ख़ास बात यह है कि हर ग़ज़ल का अलग लिंक है। आप ऊपर दी गई सूची में से कोई भी ग़ज़ल चुन सकते हैं और सीधे उसी तक पहुँच सकते हैं। पूरा संग्रह पढ़ने की ज़रूरत नहीं, जो चाहें वही खोलिए।
उर्दू ग़ज़ल की एक ख़ूबी यह भी है कि वह अनुवाद के बिना भी समझ आ जाती है। शब्द भले नए लगें, भाव वही होते हैं जो हर इंसान के दिल में होते हैं। यही वजह है कि ग़ज़ल आज भी उतनी ही ज़िंदा है जितनी सौ साल पहले थी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शारिक़ कैफ़ी की ग़ज़लें किस भाषा में हैं?
सारी ग़ज़लें देवनागरी में हैं, इसलिए उर्दू लिपि जानने की ज़रूरत नहीं। पढ़ने में कोई रुकावट नहीं आएगी।
शारिक़ कैफ़ी की ग़ज़लें कहाँ पढ़ें?
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