वो लोग जो ज़िंदा हैं वो मर जाएँगे इक दिन
वो लोग जो ज़िंदा हैं वो मर जाएँगे इक दिन
इक रात के राही हैं गुज़र जाएँगे इक दिन
यूँ दिल में उठी लहर यूँ आँखों में भरे रंग
जैसे मिरे हालात सँवर जाएँगे इक दिन
दिल आज भी जलता है उसी तेज़ हवा में
ऐ तेज़ हवा देख बिखर जाएँगे इक दिन
यूँ है कि तआक़ुब में है आसाइश-ए-दुनिया
यूँ है कि मोहब्बत से मुकर जाएँगे इक दिन
यूँ होगा कि इन आँखों से आँसू न बहेंगे
ये चाँद सितारे भी ठहर जाएँगे इक दिन
अब घर भी नहीं घर की तमन्ना भी नहीं है
मुद्दत हुई सोचा था कि घर जाएँगे इक दिन
साक़ी फ़ारूक़ी के बारे में
साक़ी फ़ारूक़ी की शायरी में एक तेज़ और बेबाक लहजा है। वे मोहब्बत और वक़्त दोनों पर एक साथ नज़र रखते हैं।
यहाँ उनकी ग़ज़लें आसान देवनागरी में पढ़ी जा सकती हैं, ताकि उर्दू लिपि न जानने वाले पाठक भी उनकी शायरी तक पहुँच सकें। हर ग़ज़ल का लिंक नीचे दिया गया है, आप सीधे उसी ग़ज़ल पर पहुँच जाएँगे।
साक़ी फ़ारूक़ी की सभी ग़ज़लें
- वो लोग जो ज़िंदा हैं वो मर जाएँगे इक दिन
- दामन में आँसुओं का ज़ख़ीरा न कर अभी
- मैं खिल नहीं सका कि मुझे नम नहीं मिला
- मिरा अकेला ख़ुदा याद आ रहा है मुझे
- ये कौन आया शबिस्ताँ के ख़्वाब पहने हुए
- बदन चुराते हुए रूह में समाया कर
- हैं सेहर-ए-मुसव्विर में क़यामत नहीं करते
- सोच में डूबा हुआ हूँ अक्स अपना देख कर
- मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा
- सफ़र की धूप में चेहरे सुनहरे कर लिए हम ने
- आग हो दिल में तो आँखों में धनक पैदा हो
- जान प्यारी थी मगर जान से बे-ज़ारी थी
- इक याद की मौजूदगी सह भी नहीं सकते
- वही आँखों में और आँखों से पोशीदा भी रहता है
- मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली
- पाँव मारा था पहाड़ों पे तो पानी निकला
- मैं फिर से हो जाऊँगा तन्हा इक दिन
साक़ी फ़ारूक़ी की ग़ज़ल में लहजा तेज़ है। वे मोहब्बत और वक़्त दोनों पर एक साथ नज़र रखते हैं, और जहाँ बात कड़वी है वहाँ उसे मीठा करके कहने की कोशिश नहीं करते। यही साफ़गोई उनकी पहचान है।
उनकी ग़ज़लों को पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप एक बार पूरी ग़ज़ल पढ़ें, और फिर जो शेर सबसे ज़्यादा छू गया उसे दोबारा पढ़ें। ग़ज़ल ऐसी ही विधा है, जहाँ हर शेर अपने आप में पूरा होता है और अलग से भी पढ़ा जा सकता है।
अगर आप उर्दू लिपि नहीं पढ़ सकते, तो कोई बात नहीं। इस पन्ने की सारी ग़ज़लें देवनागरी में हैं, इसलिए पढ़ने में कोई रुकावट नहीं आएगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
साक़ी फ़ारूक़ी की ग़ज़लें किस भाषा में हैं?
सारी ग़ज़लें देवनागरी में हैं, इसलिए उर्दू लिपि जानने की ज़रूरत नहीं। कुछ ग़ज़लें रोमन में भी मिलती हैं।
साक़ी फ़ारूक़ी की ग़ज़लें कहाँ पढ़ें?
सभी ग़ज़लें ghazalhighazal पर हैं। और शायरों का पूरा संग्रह ग़ज़ल शायरी संग्रह में एक जगह मिलेगा।
ग़ज़ल और शायरी में क्या फ़र्क़ है?
शायरी बड़ा शब्द है जिसमें ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई सब आते हैं। ग़ज़ल में हर शेर अपने आप में पूरा होता है, और सब शेर एक ही बहर में होते हैं।
साक़ी फ़ारूक़ी की शायरी में क्या अलग है?
उनका लहजा सीधा है। वे बात को घुमा कर नहीं कहते, और यही उनके शेरों की सबसे बड़ी ख़ूबी है।