संत गोरा कुंभार महाराष्ट्र के प्रसिद्ध वारकरी संत और भक्त कवि थे। उनका समय लगभग 13वीं–14वीं शताब्दी माना जाता है। उनका जन्म महाराष्ट्र के तेरढोकी गाँव में हुआ था। वे कुम्हार का काम करते थे और मिट्टी के बर्तन बनाते हुए भगवान विठ्ठल का नाम लेते थे। वे सरल जीवन, सच्ची भक्ति और अच्छे कर्म का संदेश देते थे। संत ज्ञानेश्वर और संत नामदेव जैसे संतों के साथ उनका नाम वारकरी संत परंपरा में लिया जाता है। उनकी भक्ति और सरल विचारों के कारण आज भी उन्हें श्रद्धा से याद किया जाता है।
- केशवाचें ध्यान धरूनि अंतरीं
- वरती करा कर दोन्ही
- निर्गुणाचा संग धरिला जो आवडी
- अंतरीचें गुज बोलूं ऐसें कांहीं
- एकमेकांमाजी भाव एकविध
- सरितेचा ओघ सागरीं आटला
- निर्गुणाचें भेटी आलों सगुणासंगें
- कैसें बोलणें कैसें चालणें
- मुकिया साखर चाखाया दिधली
- कवण स्तुति करूं कवणिया वाचे
- काया वाचा मन एकविध करी
- स्थूल होतें तें सुक्ष्म पैं झालें
- केशवाचे भेटी लागलें पिसें
- वंदावे कवणासी निंदावें कवणासी
- नामा ऐसें नाम तुझिया स्वरूपा
- कायसास बहु घालिसील माळ
- देवा तुझा मी कुंभार
- श्रवणें नयन जिव्हा शुद्ध करी
- रोहिदासा शिवराईसाठी
- निर्गुण रूपडे सगुणाचे बुंथी