ज़माँ मकाँ थे मिरे सामने बिखरते हुए
ज़माँ मकाँ थे मिरे सामने बिखरते हुए
मैं ढेर हो गया तूल-ए-सफ़र से डरते हुए
दिखा के लम्हा-ए-ख़ाली का अक्स-ए-ला-तफ़सीर
ये मुझ में कौन है मुझ से फ़रार करते हुए
बस एक ज़ख़्म था दिल में जगह बनाता हुआ
हज़ार ग़म थे मगर भूलते-बिसरते हुए
वो टूटते हुए रिश्तों का हुस्न-ए-आख़िर था
कि चुप सी लग गई दोनों को बात करते हुए
अजब नज़ारा था बस्ती का उस किनारे पर
सभी बिछड़ गए दरिया से पार उतरते हुए
मैं एक हादसा बन कर खड़ा था रस्ते में
अजब ज़माने मिरे सर से थे गुज़रते हुए
वही हुआ कि तकल्लुफ़ का हुस्न बीच में था
बदन थे क़ुर्ब-ए-तही-लम्स से बिखरते हुए
राजेंद्र मनचंदा 'बानी' के बारे में
राजेंद्र मनचंदा 'बानी' की ग़ज़ल में रोज़मर्रा की ज़िंदगी और उसका दर्द साफ़ दिखता है। उनके शेर बड़ी बातें नहीं करते, बस वही कहते हैं जो हर किसी के साथ होता है।
यहाँ उनकी ग़ज़लें आसान देवनागरी में पढ़ी जा सकती हैं, ताकि उर्दू लिपि न जानने वाले पाठक भी उनकी शायरी तक पहुँच सकें। हर ग़ज़ल का लिंक नीचे दिया गया है, आप सीधे उसी ग़ज़ल पर पहुँच जाएँगे।
राजेंद्र मनचंदा 'बानी' की सभी ग़ज़लें
- ज़माँ मकाँ थे मिरे सामने बिखरते हुए
- जाने वो कौन था और किस को सदा देता था
- मुझे पता था कि ये हादसा भी होना था
- तमाम रास्ता फूलों भरा है मेरे लिए
- ऐ दोस्त मैं ख़ामोश किसी डर से नहीं था
- दिन को दफ़्तर में अकेला शब भरे घर में अकेला
- वो बात बात पे जी भर के बोलने वाला
- न मंज़िलें थीं न कुछ दिल में था न सर में था
- ख़त कोई प्यार भरा लिख देना
- आज इक लहर भी पानी में न थी
- सद-सौग़ात सकूँ फ़िरदौस सितंबर आ
- इधर की आएगी इक रौ उधर की आएगी
- मैं चुप खड़ा था तअल्लुक़ में इख़्तिसार जो था
- मोड़ था कैसा तुझे था खोने वाला मैं
- देखता था मैं पलट कर हर आन
- अजीब तजरबा था भीड़ से गुज़रने का
- आज तो रोने को जी हो जैसे
- छुपी है तुझ में कोई शय उसे न ग़ारत कर
- हरी सुनहरी ख़ाक उड़ाने वाला मैं
- पैहम मौज-ए-इमकानी में / राजेन्द्र मनचंदा बानी
- हमें लपकती हवा पर सवार ले आई
- चली डगर पर कभी न चलने वाला मैं
- शोला इधर उधर कभी साया यहीं कहीं
- बजाए हम-सफ़री इतना राब्ता है बहुत
- देखिए क्या क्या सितम मौसम की मन-मानी के हैं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
राजेंद्र मनचंदा 'बानी' की ग़ज़लें किस भाषा में हैं?
सारी ग़ज़लें देवनागरी में हैं, इसलिए उर्दू लिपि जानने की ज़रूरत नहीं। कुछ ग़ज़लें रोमन में भी मिलती हैं।
राजेंद्र मनचंदा 'बानी' की ग़ज़लें कहाँ पढ़ें?
सभी ग़ज़लें ghazalhighazal पर हैं। और शायरों का पूरा संग्रह ग़ज़ल शायरी संग्रह में एक जगह मिलेगा।
ग़ज़ल और शायरी में क्या फ़र्क़ है?
शायरी बड़ा शब्द है जिसमें ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई सब आते हैं। ग़ज़ल में हर शेर अपने आप में पूरा होता है, और सब शेर एक ही बहर में होते हैं।