गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं
गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं
हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं
शम्अ' जिस आग में जलती है नुमाइश के लिए
हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं
बच निकलते हैं अगर आतिश-ए-सय्याल से हम
शोला-ए-आरिज़-ए-गुलफ़ाम से जल जाते हैं
ख़ुद-नुमाई तो नहीं शेवा-ए-अरबाब-ए-वफ़ा
जिन को जलना हो वो आराम से जल जाते हैं
रब्त-ए-बाहम पे हमें क्या न कहेंगे दुश्मन
आश्ना जब तिरे पैग़ाम से जल जाते हैं
जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ
जाने क्यूँ लोग मिरे नाम से जल जाते हैं
क़तील शिफ़ाई के बारे में
क़तील शिफ़ाई शायर और फ़िल्मी गीतकार दोनों थे। उन्होंने फ़िल्मों के लिए सैकड़ों गीत लिखे, पर ग़ज़ल उनका पहला प्यार रही। उनकी भाषा आसान है और मतलब सीधा।
यहाँ उनकी ग़ज़लें आसान देवनागरी में पढ़ी जा सकती हैं, ताकि उर्दू लिपि न जानने वाले पाठक भी उनकी शायरी तक पहुँच सकें। हर ग़ज़ल का लिंक नीचे दिया गया है, आप सीधे उसी ग़ज़ल पर पहुँच जाएँगे।
क़तील शिफ़ाई की सभी ग़ज़लें
- गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं
- अपने हाथों की लकीरों में सजा ले मुझ को
- परेशाँ रात सारी है सितारो तुम तो सो जाओ
- वो दिल ही क्या तिरे मिलने की जो दुआ न करे
- तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं
- अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ
- हालात के क़दमों पे क़लंदर नहीं गिरता
- किया है प्यार जिसे हम ने ज़िंदगी की तरह
- सदमा तो है मुझे भी कि तुझ से जुदा हूँ मैं
- ये मो'जिज़ा भी मोहब्बत कभी दिखाए मुझे
- हुस्न को चाँद जवानी को कँवल कहते हैं
- वो शख़्स कि मैं जिस से मोहब्बत नहीं करता
- तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते
- लिख दिया अपने दर पे किसी ने इस जगह प्यार करना मना है
- चाँदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल
- अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की
- मिल कर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम
- खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें
- दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था
- ये किस ने कहा तुम कूच करो बातें न बनाओ इंशा-जी
- मैं ने पूछा पहला पत्थर मुझ पर कौन उठाएगा
- उल्फ़त की नई मंज़िल को चला तू बाँहें डाल के बाँहों में
- उस अदा से भी हूँ मैं आश्ना तुझे इतना जिस पे ग़ुरूर है
- यारो किसी क़ातिल से कभी प्यार न माँगो
- हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क़तील शिफ़ाई की ग़ज़लें किस भाषा में हैं?
सारी ग़ज़लें देवनागरी में हैं, इसलिए उर्दू लिपि जानने की ज़रूरत नहीं। कुछ ग़ज़लें रोमन में भी मिलती हैं।
क़तील शिफ़ाई की ग़ज़लें कहाँ पढ़ें?
सभी ग़ज़लें ghazalhighazal पर हैं। और शायरों का पूरा संग्रह ग़ज़ल शायरी संग्रह में एक जगह मिलेगा।
ग़ज़ल और शायरी में क्या फ़र्क़ है?
शायरी बड़ा शब्द है जिसमें ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई सब आते हैं। ग़ज़ल में हर शेर अपने आप में पूरा होता है, और सब शेर एक ही बहर में होते हैं।