वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही या'नी वा'दा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो
वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे बेशतर वो करम कि था मिरे हाल पर
मुझे सब है याद ज़रा ज़रा तुम्हें याद हो कि न याद हो
वो नए गिले वो शिकायतें वो मज़े मज़े की हिकायतें
वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो कि न याद हो
कभी बैठे सब में जो रू-ब-रू तो इशारतों ही से गुफ़्तुगू
वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो कि न याद हो
हुए इत्तिफ़ाक़ से गर बहम तो वफ़ा जताने को दम-ब-दम
गिला-ए-मलामत-ए-अक़रिबा तुम्हें याद हो कि न याद हो
कोई बात ऐसी अगर हुई कि तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो कि न याद हो
कभी हम में तुम में भी चाह थी कभी हम से तुम से भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आश्ना तुम्हें याद हो कि न याद हो
सुनो ज़िक्र है कई साल का कि किया इक आप ने वा'दा था
सो निबाहने का तो ज़िक्र क्या तुम्हें याद हो कि न याद हो
कहा मैं ने बात वो कोठे की मिरे दिल से साफ़ उतर गई
तो कहा कि जाने मिरी बला तुम्हें याद हो कि न याद हो
वो बिगड़ना वस्ल की रात का वो न मानना किसी बात का
वो नहीं नहीं की हर आन अदा तुम्हें याद हो कि न याद हो
जिसे आप गिनते थे आश्ना जिसे आप कहते थे बा-वफ़ा
मैं वही हूँ 'मोमिन'-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो कि न याद हो
मोमिन ख़ाँ मोमिन के बारे में
मोमिन ख़ाँ मोमिन दिल्ली के उन शायरों में हैं जिनकी ग़ज़ल आज भी महफ़िलों में गाई जाती है। ग़ालिब उनके समकालीन थे। उनकी शायरी में शिकायत और मोहब्बत एक साथ चलते हैं।
यहाँ उनकी ग़ज़लें आसान देवनागरी में पढ़ी जा सकती हैं, ताकि उर्दू लिपि न जानने वाले पाठक भी उनकी शायरी तक पहुँच सकें। हर ग़ज़ल का लिंक नीचे दिया गया है, आप सीधे उसी ग़ज़ल पर पहुँच जाएँगे।
मोमिन ख़ाँ मोमिन की सभी ग़ज़लें
- वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
- असर उस को ज़रा नहीं होता
- आँखों से हया टपके है अंदाज़ तो देखो
- रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह
- दफ़्न जब ख़ाक में हम सोख़्ता-सामाँ होंगे
- ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम
- क़हर है मौत है क़ज़ा है इश्क़
- महशर में पास क्यूँ दम-ए-फ़रियाद आ गया
- दिल-बस्तगी सी है किसी ज़ुल्फ़-ए-दुता के साथ
- ग़ैरों पे खुल न जाए कहीं राज़ देखना
- वो कहाँ साथ सुलाते हैं मुझे
- डर तो मुझे किस का है कि मैं कुछ नहीं कहता
- करता है क़त्ल-ए-आम वो अग़्यार के लिए
- तुम भी रहने लगे ख़फ़ा साहब
- दिल क़ाबिल-ए-मोहब्बत-ए-जानाँ नहीं रहा
- अदम में रहते तो शाद रहते उसे भी फ़िक्र-ए-सितम न होता
- अगर ग़फ़्लत से बाज़ आया जफ़ा की
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मोमिन ख़ाँ मोमिन की ग़ज़लें किस भाषा में हैं?
सारी ग़ज़लें देवनागरी में हैं, इसलिए उर्दू लिपि जानने की ज़रूरत नहीं। कुछ ग़ज़लें रोमन में भी मिलती हैं।
मोमिन ख़ाँ मोमिन की ग़ज़लें कहाँ पढ़ें?
सभी ग़ज़लें ghazalhighazal पर हैं। और शायरों का पूरा संग्रह ग़ज़ल शायरी संग्रह में एक जगह मिलेगा।
ग़ज़ल और शायरी में क्या फ़र्क़ है?
शायरी बड़ा शब्द है जिसमें ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई सब आते हैं। ग़ज़ल में हर शेर अपने आप में पूरा होता है, और सब शेर एक ही बहर में होते हैं।