भक्ति आंदोलन की सबसे चमकती हस्ती, कृष्ण की दीवानी मीराबाई का नाम भक्तों के दिलों में बसता है। राजस्थान की इस राजकुमारी ने अपना पूरा जीवन श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया। उनके भजन आज भी उतने ही ताज़ा हैं जितने सैकड़ों साल पहले थे। मीरा के भजनों में प्रेम, विरह, समर्पण और भक्ति की अनूठी झलक मिलती है। चाहे “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो” हो या “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई” – उनके हर भजन में कृष्ण प्रेम की मादकता है।
यहाँ मीराबाई के लोकप्रिय भजनों और पदों का प्रामाणिक संग्रह दिया गया है:
| नाम | मीराबाई (मीरा) – कृष्ण भक्ति की अमर संत |
| जन्म स्थान एवं तिथि | 1498 – कुड़की गाँव, मेड़ता, राजस्थान |
| सम्मान / उपाधि | भक्ति आंदोलन की प्रमुख संत, कृष्ण प्रेम की प्रतीक, राजपूत राजकुमारी संत मीरा |
| विशेष उपलब्धि | सैकड़ों भजन, पद और कृष्ण प्रेम की अमर रचनाएँ; विष पीकर भी कृष्ण कृपा से अमर रहीं |
| रोचक तथ्य | राजघराने की बहू होते हुए भी साध्वी बनीं; अंतिम समय में द्वारिका में कृष्ण प्रतिमा में विलीन हुईं |
| साहित्यिक भाषा | मीरा के भजन ब्रज, राजस्थानी और गुजराती मिश्रित भाषा में मिलते हैं |
| निधन | 1547 (द्वारिका, गुजरात) – कृष्ण भक्ति में लीन |
मीराबाई के सबसे प्रसिद्ध भजन
- मीरा शरण गही चरणन की लाज रखो महाराज – Mira Sharan Gahi Charanon (प्रसिद्ध भजन)
- सखी मेरी नींद नसानी हो – Sakhi Meri Neend Nasani Ho (विरह भजन)
- सुण लीजो बिनती मोरी मैं शरण गही प्रभु तेरी – Sun Lijo Binti Mori
- स्याम मने चाकर राखो जी गिरधारी जी – Shyam Mane Chakar Rakho Ji
- हरि मेरे जीवन प्राण अधार – Hari Mere Jeevan Pran Adhaar
- जागो बंसीवारे जागो मोरे ललन – Jago Bansivare Jago More Lalan
मीराबाई के प्रेम और विरह भजन
- बंसीवारा आज्यो म्हारे देस, सांवरी सुरत – Bansiwara Aajyo Mhare Des
- प्रभुजी मैं अरज करुं छूं म्हारो बेड़ो पार – Prabhuji Main Arj Karun
- बाला मैं बैरागण हूंगी – Bala Main Bairagan Hoonki
- बादल देख डरी हो स्याम मैं बादल देख डरी – Baadal Dekh Dari Ho Shyam
मीराबाई के वृन्दावन एवं अन्य भजन
- आज मोहिं लागे वृन्दावन नीको – Aaj Mohin Lage Vrindavan Neeko
- कोई कहियौ रे प्रभु आवनकी – Koi Kahiye Re Prabhu Aavanki
- मीराबाई के पद अर्थ सहित – Mira Bai Ke Pad Arth Vyakhya (संपूर्ण संग्रह)
मीराबाई: कृष्ण प्रेम और भक्ति का अमर स्वरूप
मीराबाई का जन्म 1498 में राजस्थान के मेड़ता में हुआ था। बचपन से ही उनका मन श्री कृष्ण में लगा। विवाह के बाद भी उनका कृष्ण प्रेम कम नहीं हुआ। उनके ससुराल वालों ने उन्हें कई बार कष्ट पहुँचाने और विष देने का प्रयास किया, लेकिन कृष्ण कृपा से वह हर संकट से मुक्त रहीं। अंत में उन्होंने संसार त्याग दिया और वृन्दावन व द्वारका में कृष्ण भक्ति में लीन रहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
मीराबाई का सबसे प्रसिद्ध भजन कौन सा है?
मीराबाई के सबसे प्रसिद्ध भजनों में “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो”, “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई”, और “जागो बंसीवारे जागो” प्रमुख हैं।
मीराबाई ने भजन किस भाषा में लिखे?
मीराबाई ने अपने पद और भजन मुख्य रूप से ब्रज भाषा, राजस्थानी और गुजराती मिश्रित शब्दावली में रचे हैं।
मीराबाई के पदों का मूल भाव क्या है?
मीराबाई के पदों में माधुर्य भाव, अनन्य समर्पण, विरह की तड़प और श्री कृष्ण के प्रति निष्काम भक्ति का अद्भुत समन्वय मिलता है।
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