बुधजनजी जैन साहित्य के जाने-माने कवि थे। उन्होंने धर्म और आध्यात्मिक जीवन से जुड़े विषयों पर अनेक पद और भजन रचे। उनकी रचनाओं में आत्मा, कर्म, संसार, वैराग्य और धर्म के प्रति विश्वास जैसे विषय प्रमुख हैं। उनकी काव्य भाषा सहज होने के कारण उनके पदों को भजन के रूप में गाना आसान रहा है। जैन पद साहित्य में बुधजनजी की रचनाओं का अपना महत्व है।
- बन्यौ म्हांरै या घरीमैं रंग
- कींपर करो जी गुमान
- अब घर आये चेतनराय
- हमकौं कछू भय ना रे
- म्हे तौ थांका चरणां लागां
- और ठौर क्यों हेरत प्यारा, तेरे हि घट में जानन हारा
- काल अचानक ही ले जायगा
- तन देख्या अथिर घिनावना
- तेरो करि लै काज वक्त फिरना
- भजन बिन यौं ही जनम गमायो
- अरे हाँ रे तैं तो सुधरी बहुत बिगारी
- मैंने देखा आतमराम
- अब अघ करत लजाय रे भाई
- तोकौं सुख नहिं होगा लोभीड़ा!
- नरभव पाय फेरि दुख भरना
- आगै कहा करसी भैया
- बाबा मैं न काहूका
- धर्म बिन कोई नहीं अपना
- निजपुर में आज मची होरी
- मेरा साँई तौ मोमैं नाहीं न्यारा
- उत्तम नरभव पायकै
- जिनबानी के सुनैसौं मिथ्यात मिटै
- मति भोगन राचौ जी
- सम्यग्ज्ञान बिना, तेरो जनम अकारथ जाय
- भोगारां लोभीड़ा, नरभव खोयौ रे अज्ञान