कभी गोकुल कभी राधा कभी मोहन बन के/ अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
कभी गोकुल कभी राधा कभी मोहन बन के
मैं ख़यालों में भटकती रही जोगन बन के
हर जनम में मुझे यादों के खिलौने दे के
वो बिछड़ता रहा मुझ से मिरा बचपन बन के
मेरे अंदर कोई तकता रहा रस्ता उस का
मैं हमेशा के लिए रह गई चिलमन बन के
ज़िंदगी भर मैं खुली छत पे खड़ी भीगा की
सिर्फ़ इक लम्हा बरसता रहा सावन बन के
मेरी उम्मीदों से लिपटे रहे अंदेशों के साँप
उम्र हर दौर में कटती रही चंदन बन के
इस तरह मेरी कहानी से धुआँ उठता है
जैसे सुलगे कोई हर लफ़्ज़ में ईंधन बन के
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा के बारे में
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा की शायरी में नज़ाकत और साफ़गोई दोनों हैं। उनके शेर आसान शब्दों में गहरी बात कहते हैं, और इसीलिए बार-बार पढ़ने पर भी नए लगते हैं।
ग़ज़ल में हर शेर अपने आप में पूरा होता है। इसका मतलब यह है कि आप ग़ज़ल बीच से भी पढ़ सकते हैं और किसी एक शेर पर रुक भी सकते हैं। ज़रूरी नहीं कि पहले शेर से ही शुरू करें, जो शेर आपको छू जाए वहीं से पढ़ना शुरू कीजिए।
ग़ज़ल पढ़ने के लिए बहुत ज़्यादा तैयारी की ज़रूरत नहीं होती। एक बार पढ़िए, फिर जो शेर समझ न आए उसे दोबारा पढ़िए। उर्दू शायरी में कई शब्द ऐसे हैं जो पहली बार में अजीब लगते हैं, पर दो-तीन ग़ज़लें पढ़ने के बाद वे आसान हो जाते हैं।
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा की सभी ग़ज़लें
- कभी गोकुल कभी राधा कभी मोहन बन के/ अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
- अपनी बीती हुई रंगीन जवानी देगा
- हम कोई नादान नहीं कि बच्चों की सी बात करें
- ज़िंदगी के सारे मौसम आ के रुख़्सत हो गए
- थकन से चूर हूँ लेकिन रवाँ-दवाँ हूँ मैं
- ज़रा मुश्किल से समझेंगे हमारे तर्जुमाँ हम को
- मुझे कहाँ मिरे अंदर से वो निकालेगा
- फूँक देंगे मिरे अंदर के उजाले मुझ को
- रूठ जाएगा तो मुझ से और क्या ले जाएगा
- अलावा इक चुभन के क्या है ख़ुद से राब्ता मेरा
- वो ये कह कह के जलाता था हमेशा मुझ को
इस पन्ने पर उनकी ग़ज़लें एक जगह रखी गई हैं। नीचे दी गई सूची में हर ग़ज़ल का लिंक है, आप जिसे चाहें उसे खोल कर पूरी ग़ज़ल पढ़ सकते हैं।
उर्दू ग़ज़ल की एक ख़ूबी यह है कि वह अनुवाद के बिना भी समझ आ जाती है। शब्द भले नए लगें, भाव वही होते हैं जो हर इंसान के दिल में होते हैं। इसीलिए ग़ज़ल आज भी उतनी ही ज़िंदा है जितनी सौ साल पहले थी।
अगर पहली बार उर्दू शायरी पढ़ रहे हैं, तो धीरे-धीरे आगे बढ़िए। एक ग़ज़ल पूरी पढ़ लेने के बाद अगली खोलिए। जल्दबाज़ी में सब पढ़ने से मज़ा भी कम आएगा और बात भी कम समझ आएगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा की ग़ज़लें किस भाषा में हैं?
सारी ग़ज़लें देवनागरी में हैं, इसलिए उर्दू लिपि जानने की ज़रूरत नहीं। पढ़ने में कोई रुकावट नहीं आएगी।
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा की ग़ज़लें कहाँ पढ़ें?
सभी ग़ज़लें ghazalhighazal पर हैं। और शायरों का पूरा संग्रह ग़ज़ल शायरी संग्रह में मिलेगा।
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