तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो
तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो
मैं बहुत दिनों से उदास हूँ मुझे कोई शाम उधार दो
मुझे अपने रूप की धूप दो कि चमक सकें मिरे ख़ाल-ओ-ख़द
मुझे अपने रंग में रंग दो मिरे सारे रंग उतार दो
किसी और को मिरे हाल से न ग़रज़ है कोई न वास्ता
मैं बिखर गया हूँ समेट लो मैं बिगड़ गया हूँ सँवार दो
ऐतबार साजिद के बारे में
ऐतबार साजिद की ग़ज़ल में मोहब्बत के साथ उसका हिसाब भी है। वे जज़्बे में बहते नहीं, ठहर कर सोचते हैं, और यही उनकी अलग पहचान है।
यहाँ उनकी ग़ज़लें आसान देवनागरी में पढ़ी जा सकती हैं, ताकि उर्दू लिपि न जानने वाले पाठक भी उनकी शायरी तक पहुँच सकें। हर ग़ज़ल का लिंक नीचे दिया गया है, आप सीधे उसी ग़ज़ल पर पहुँच जाएँगे।
ऐतबार साजिद की सभी ग़ज़लें
- वो पहली जैसी वहशतें वो हाल ही नहीं रहा ऐतबार साजिद
- ये हसीं लोग हैं तू इन की मुरव्वत पे न जा /ऐतबार साजिद
- ये ठीक है कि बहुत वहशतें भी ठीक नहीं /ऐतबार साजिद
- मैं तकिए पर सितारे बो हा हूँ /ऐतबार साजिद
- मिरी रूह में जो उतर सकें वो मोहब्बतें मुझे चाहिएँ /ऐतबार साजिद
- ऐतबार साजिद
- मिरा है कौन दुश्मन मेरी चाहत कौन रखता है /ऐतबार साजिद
- बहुत सजाए थे आँखों में ख़्वाब मैं ने भी /ऐतबार साजिद
- बंदे ज़मीन और आसमाँ सरमा की शब कहानियाँ /ऐतबार साजिद
- फूल थे रंग थे लम्हों की सबाहत हम थे /ऐतबार साजिद
- न गुमान मौत का है न ख़याल ज़िंदगी का /ऐतबार साजिद
- धड़कन धड़कन यादों की बारात अकेला कमरा /ऐतबार साजिद
- तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो /ऐतबार साजिद
- जाने किस चाह के किस प्यार के गुन गाते हो /ऐतबार साजिद
- ज़ख़्मों का दो-शाला पहना धूप को सर पर तान लिया /ऐतबार साजिद
- छोटे छोटे से मफ़ादात लिए फिरते हैं /ऐतबार साजिद
- घर की दहलीज़ से बाज़ार में मत आ जाना /ऐतबार साजिद
- आने वाली थी ख़िज़ाँ मैदान ख़ाली कर दिया /ऐतबार साजिद
- आँखों से अयाँ ज़ख़्म की गहराई तो अब है /ऐतबार साजिद
ऐतबार साजिद की ग़ज़ल पढ़ते हुए लगता है कि शायर अपने ही दिल से हिसाब माँग रहा है। वे जज़्बात में बहते नहीं, उन्हें तौलते हैं। यही ठहराव उनके शेरों को दूसरे शायरों से अलग करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ऐतबार साजिद की ग़ज़लें किस भाषा में हैं?
सारी ग़ज़लें देवनागरी में हैं, इसलिए उर्दू लिपि जानने की ज़रूरत नहीं। कुछ ग़ज़लें रोमन में भी मिलती हैं।
ऐतबार साजिद की ग़ज़लें कहाँ पढ़ें?
सभी ग़ज़लें ghazalhighazal पर हैं। और शायरों का पूरा संग्रह ग़ज़ल शायरी संग्रह में एक जगह मिलेगा।
ग़ज़ल और शायरी में क्या फ़र्क़ है?
शायरी बड़ा शब्द है जिसमें ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई सब आते हैं। ग़ज़ल में हर शेर अपने आप में पूरा होता है, और सब शेर एक ही बहर में होते हैं।
ऐतबार साजिद की ग़ज़ल का मिज़ाज कैसा है?
सोचने वाला। वे मोहब्बत की बात करते हैं पर उसका हिसाब भी रखते हैं, इसलिए उनके शेर सिर्फ़ जज़्बाती नहीं, समझदार भी लगते हैं।