कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा
कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा
मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा
तेरा दर छोड़ के मैं और किधर जाऊँगा
घर में घिर जाऊँगा सहरा में बिखर जाऊँगा
तेरे पहलू से जो उठ्ठूँगा तो मुश्किल ये है
सिर्फ़ इक शख़्स को पाऊँगा जिधर जाऊँगा
अब तिरे शहर में आऊँगा मुसाफ़िर की तरह
साया-ए-अब्र की मानिंद गुज़र जाऊँगा
तेरा पैमान-ए-वफ़ा राह की दीवार बना
वर्ना सोचा था कि जब चाहूँगा मर जाऊँगा
चारासाज़ों से अलग है मिरा मेआ'र कि मैं
ज़ख़्म खाऊँगा तो कुछ और सँवर जाऊँगा
अब तो ख़ुर्शीद को गुज़रे हुए सदियाँ गुज़रीं
अब उसे ढूँडने मैं ता-ब-सहर जाऊँगा
ज़िंदगी शम्अ' की मानिंद जलाता हूँ 'नदीम'
बुझ तो जाऊँगा मगर सुब्ह तो कर जाऊँगा
अहमद नदीम क़ासमी के बारे में
अहमद नदीम क़ासमी शायर के साथ कहानीकार भी थे। इसीलिए उनकी ग़ज़ल में किस्सा कहने की तरह एक बहाव है, और आम आदमी की ज़िंदगी उसमें साफ़ दिखती है।
यहाँ उनकी ग़ज़लें आसान देवनागरी में पढ़ी जा सकती हैं, ताकि उर्दू लिपि न जानने वाले पाठक भी उनकी शायरी तक पहुँच सकें। हर ग़ज़ल का लिंक नीचे दिया गया है, आप सीधे उसी ग़ज़ल पर पहुँच जाएँगे।
अहमद नदीम क़ासमी की सभी ग़ज़लें
- अहमद नदीम क़ासमी
- अजीब रंग तिरे हुस्न का लगाव में था अहमद नदीम क़ासमी
- अपने माहौल से थे क़ैस के रिश्ते क्या क्या अहमद नदीम क़ासमी
- अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की अहमद नदीम क़ासमी
- इक मोहब्बत के एवज़ अर्ज़ ओ समा दे दूँगा अहमद नदीम क़ासमी
- उम्र भर उस ने इसी तरह लुभाया है मुझे अहमद नदीम क़ासमी
- एहसास में फूल खिल रहे हैं अहमद नदीम क़ासमी
- क़लम दिल में डुबोया जा रहा है अहमद नदीम क़ासमी
- कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा अहमद नदीम क़ासमी
- Ahmed Nadeem Qasami Ghazal
- खड़ा था कब से ज़मीं पीठ पर उठाए हुए अहमद नदीम क़ासमी
- जाने कहाँ थे और चले थे कहाँ से हम अहमद नदीम क़ासमी
- जब तिरा हुक्म मिला तर्क मोहब्बत कर दी अहमद नदीम क़ासमी
- जी चाहता है फ़लक पे जाऊँ अहमद नदीम क़ासमी
- तू जो बदला तो ज़माना भी बदल जाएगा अहमद नदीम क़ासमी
- फ़ासले के मअ'नी का क्यूँ फ़रेब खाते हो अहमद नदीम क़ासमी
- तेरी महफ़िल भी मुदावा नहीं तन्हाई का अहमद नदीम क़ासमी
- फिर भयानक तीरगी में आ गए अहमद नदीम क़ासमी
- फूलों से लहू कैसे टपकता हुआ देखूँ अहमद नदीम क़ासमी
- मरूँ तो मैं किसी चेहरे में रंग भर जाऊँ अहमद नदीम क़ासमी
- मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता अहमद नदीम क़ासमी
- मैं हूँ या तू है ख़ुद अपने से गुरेज़ाँ जैसे अहमद नदीम क़ासमी
- लबों पे नर्म तबस्सुम रचा के धुल जाएँ अहमद नदीम क़ासमी
- वो कोई और न था चंद ख़ुश्क पत्ते थे अहमद नदीम क़ासमी
- साँस लेना भी सज़ा लगता है अहमद नदीम क़ासमी
- शुऊर में कभी एहसास में बसाऊँ उसे अहमद नदीम क़ासमी
- सूरज को निकलना है सो निकलेगा दोबारा अहमद नदीम क़ासमी
- हम कभी इश्क़ को वहशत नहीं बनने देते अहमद नदीम क़ासमी
- हर लम्हा अगर गुरेज़-पा है अहमद नदीम क़ासमी
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अहमद नदीम क़ासमी की ग़ज़लें किस भाषा में हैं?
सारी ग़ज़लें देवनागरी में हैं, इसलिए उर्दू लिपि जानने की ज़रूरत नहीं। कुछ ग़ज़लें रोमन में भी मिलती हैं।
अहमद नदीम क़ासमी की ग़ज़लें कहाँ पढ़ें?
सभी ग़ज़लें ghazalhighazal पर हैं। और शायरों का पूरा संग्रह ग़ज़ल शायरी संग्रह में एक जगह मिलेगा।
ग़ज़ल और शायरी में क्या फ़र्क़ है?
शायरी बड़ा शब्द है जिसमें ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई सब आते हैं। ग़ज़ल में हर शेर अपने आप में पूरा होता है, और सब शेर एक ही बहर में होते हैं।