मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है
मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है
वो इसी शहर की गलियों में कहीं रहता है
जिस की साँसों से महकते थे दर-ओ-बाम तिरे
ऐ मकाँ बोल कहाँ अब वो मकीं रहता है
इक ज़माना था कि सब एक जगह रहते थे
और अब कोई कहीं कोई कहीं रहता है
रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए
इश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता है
दिल फ़सुर्दा तो हुआ देख के उस को लेकिन
उम्र भर कौन जवाँ कौन हसीं रहता है
अहमद मुश्ताक़ के बारे में
अहमद मुश्ताक़ की ग़ज़ल में भाषा की सफ़ाई और ख़याल की गहराई दोनों मिलते हैं। उनके शेर पढ़ते हुए लगता है कि बात बहुत सोच-समझ कर कही गई है।
यहाँ उनकी ग़ज़लें आसान देवनागरी में पढ़ी जा सकती हैं, ताकि उर्दू लिपि न जानने वाले पाठक भी उनकी शायरी तक पहुँच सकें। हर ग़ज़ल का लिंक नीचे दिया गया है, आप सीधे उसी ग़ज़ल पर पहुँच जाएँगे।
अहमद मुश्ताक़ की सभी ग़ज़लें
- अहमद मुश्ताक ग़ज़ल / Ahmad Mushtaq Ghazal
- अजब नहीं कभी नग़्मा बने फ़ुग़ाँ मेरी अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- अब वो गलियाँ वो मकाँ याद नहीं अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- आज रो कर तो दिखाए कोई ऐसा रोना अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- इक फूल मेरे पास था इक शम्अ मेरे साथ थी अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- इन मौसमों में नाचते गाते रहेंगे हम अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- इश्क़ में कौन बता सकता है अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- उजला तिरा बर्तन है और साफ़ तिरा पानी अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- उदास कर के दरीचे नए मकानों के अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- कहीं उम्मीद सी है दिल के निहाँ ख़ाने में अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- किस झुटपुटे के रंग उजालों में आ गए अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- किस शय पे यहाँ वक़्त का साया नहीं होता अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- ख़्वाब के फूलों की ताबीरें कहानी हो गईं अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- चमक दमक पे न जाओ खरी नहीं कोई शय अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- चश्म ओ लब कैसे हों रुख़्सार हों कैसे तेरे अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- चाँद इस घर के दरीचों के बराबर आया अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- छिन गई तेरी तमन्ना भी तमन्नाई से अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- ज़मीं से उगती है या आसमाँ से आती है अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- ज़िंदगी से एक दिन मौसम ख़फ़ा हो जाएँगे अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- ज़ुल्फ़ देखी वो धुआँ-धार वो चेहरा देखा अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
- टूट गया हवा का ज़ोर सैल-ए-बला उतर गया अहमद मुश्ताक ग़ज़ल
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अहमद मुश्ताक़ की ग़ज़लें किस भाषा में हैं?
सारी ग़ज़लें देवनागरी में हैं, इसलिए उर्दू लिपि जानने की ज़रूरत नहीं। कुछ ग़ज़लें रोमन में भी मिलती हैं।
अहमद मुश्ताक़ की ग़ज़लें कहाँ पढ़ें?
सभी ग़ज़लें ghazalhighazal पर हैं। और शायरों का पूरा संग्रह ग़ज़ल शायरी संग्रह में एक जगह मिलेगा।
ग़ज़ल और शायरी में क्या फ़र्क़ है?
शायरी बड़ा शब्द है जिसमें ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई सब आते हैं। ग़ज़ल में हर शेर अपने आप में पूरा होता है, और सब शेर एक ही बहर में होते हैं।